कृषि, बागवानी एवं नगदी फसल के लिए प्रदेश में अग्रणी रर्वाइं क्षेत्र के काश्तकार अब चाईनीज कैवेज की खेती कर लाखों रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं। मोरी ब्लाक के रमाल गांव व डांडाक्यारी में इसकी खेती की जा रही है।
लाल चावल, राजमा, टमाटर, मटर आदि नगदी सब्जियों की व्यापक पैदावार के बाद काश्तकार नित नए प्रयोग में लगे हुए हैं। काश्तकारों ने इसका उत्पादन भी शुरू कर दिया है।
मोरी ब्लाक के रमाल गांव में देहरादून के रानी पोखरी निवासी अजय कुमार ने दस नाली भूमि किराए पर लेकर उसमें चाईनीज कैवेज की खेती शुरू की और अब वह मात्र चार माह में करीब दो लाख रुपये की कमाई कर रहा है। अजय कुुमार बताते है कि सितंबर में इसकी नर्सरी तैयार की जाती है।
25 दिन बाद पौधा तैयार हो जाता है। अक्तूबर में इसका रोपण कर दिसंबर में यह तैयार हो जाता है। दस नाली खेत में दस हजार पौधों से करीब 2.50 लाख रुपये की सब्जी तैयार हो जाती है।
इस पर 35 से 40 हजार तक खर्चा आ जाता है। देहरादून व दिल्ली में इसकी कीमत 50 से 60 रुपये प्रति किलो है, लेकिन यहां विपणन की व्यवस्था नहीं होने पर पुरोला, मोरी, नैटवाड आदि में तीस रुपये किलो बिक जाती है।
प्रमोद रांगड़ का कहना है कि क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में पानी होने के बावजूद नहरों की हालात ठीक नहीं है। काश्तकारों को पानी का ढुलान कर खेतों में सिंचाई करनी पड़ती है।
बिंगसारी नहर गत पांच वर्षों से बंद पड़ी है। आलू एवं साग भाजी अधिकारी डा. सुरेश राम का कहना है कि चाईनीज कैवेज के लिए रवाईं क्षेत्र अनुकूल है।