जिले के 88 गांव आज भी विकास के लिए केंद्र और राज्य सरकार का मुंह ताक रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है इको सेंसिटिव जोन, जिससे ये गांव वर्षों बाद भी विकास से कोशों दूर हैं।
गंगोत्री से उत्तरकाशी हाईवे पर करीब 100 किमी का क्षेत्र इको सेंसिटिव जोन घोषित है।
इस बीच गंगा नदी के दोनों और भटवाड़ी ब्लॉक के करीब 88 गांव हैं। इको सेंसिटिव जोन की वजह से गांव के लोग अपने हक-हकूक से महरूम हैं। उन्हें अपनी जमीन पर घर बनाने के लिए भी सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है।
भवन निर्माण भी पारंपरिक तरीके से लकड़ी का होगा। निर्माण कार्य में सीमेंट का प्रयोग नहीं किया जाएगा। क्षेत्र के ज्यादातर लोग किसान हैं। ऐसे में लोग जंगलों से लकड़ी और चारे का भी दोहन नहीं कर सकते हैं। भवन निर्माण की तरह गांव के रास्ते भी कच्चे बनाए जाएंगे।
हाईवे के अलावा यहां कोई अन्य पक्के संपर्क मार्ग नहीं बन पाए हैं, जिससे बागवानी करने वाले लोगों को घोड़े और खच्चरों की सहायता से फल व सब्जियों को हाईवे तक पहुंचाना पड़ता है। जिले में कुछ बड़ी और अहम जल विद्युत परियोजनाएं लोहारी नागपाला व पाला मनेरी जैसे प्रोजेक्ट भी इको सेंसटिव क्षेत्र होने के चलते अभी तक अधर में फंसे हैं।
प्रशासन की ओर से पूर्व में कई बार इको सेंसिटिव क्षेत्र के पक्ष व विपक्ष को लेकर लोगों का मत जानने के लिए खुली बैठकें भी आयोजित की गई, लेकिन ग्रामीणों ने इसका खुलकर विरोध किया है।