मोरी ब्लाक के ओसला गांव में निर्माणाधीन चिलूड़गाड परियोजना वर्ष 2007 में स्वीकृत हुई। 1.60 करोड़ रुपये लागत से स्वीकृत 100 किलोवाट की परियोजना पर करीब एक करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन अभी तक निर्माण कार्य आधा-अधूरा ही हो पाया है।
मोरी ब्लाक में सड़क मार्ग से 10 से 14 किमी पैदल दूरी वाले गंगाड़, पवांणी और ओसला गांव में बिजली नहीं है। इन गांवों के कुछ घरों में तो सोलर लालटेन हैं, जबकि अधिकांश लोग छिल्लों की रोशनी में रात काटने को मजबूर हैं। ग्रामीणों की दिक्कतों को देखते हुए सरकार ने वर्ष 2007 में यहां 100 किलोवाट की चिलूड़गाड लघु जल विद्युत परियोजना स्वीकृत की। 1.60 करोड़ रुपये लागत की परियोजना के सिविल कार्यों का जिम्मा अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण (उरेडा) ने इन गांवों के बीच एक समिति बनाकर उसे सौंपी।
नौ साल बाद स्थिति यह है कि मौके पर पावर हाउस का आधा-अधूरा भवन और पावर चैनल बन पाई है। इसके भीतर टरबाइनें लगाने का बेस तक तैयार नहीं हुआ है। पेनस्टोक के पाइप निर्माण स्थल से आठ किमी पीछे ढाटमीर के पास और मशीनें आखिरी सड़क पड़ाव तालुका तक पहुंची हैं। बिजली के खंभे गाड़ कर इन पर तार जरूर बिछा दी गई हैं। इन्हीं कामों पर करीब एक करोड़ रुपये खर्च हो चुका है।
बगैर बिजली के ओसला, पवाणी एवं गंगाड़ के ग्रामीणों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। चिलूड़गाड बिजली परियोजना पर उम्मीदें टिकी थी, लेकिन धरातल पर देखकर लगता नहीं कि अगले दो-तीन साल में भी यह तैयार हो पाएगी। सरकार शीघ्र परियोजना को तैयार कर इन गांवों को बिजली मुहैया कराने के इंतजाम करे।
वरदान सिंह राणा, पूर्व प्रधान ओसला।
मैंने वर्ष 2014 में ही कार्यभार ग्रहण किया है। पूर्व में हुए कार्यों के बारे में मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। समिति के ऑडिट आदि औपचारिकताएं पूरी नहीं होने के कारण अवशेष भुगतान नहीं हो पा रहा है। परियोजना पर समिति के बजाय सीधे विभाग से ही काम कराने का प्रस्ताव उच्चाधिकारियों को भेजा है।
मनोज कुमार, परियोजना अधिकारी उरेडा उत्तरकाशी।