मोरी ब्लाक में आग लगने से गांव के गांव स्वाह होने की घटनाएं होती रही हैं। बीते पांच सालों में ही यहां आग लगने की सात घटनाओं में करीब एक सौ मकान स्वाह हो चुके हैं। इसके बावजूद अभी तक सरकार आग लगने की घटनाओं पर नियंत्रण की कोई ठोस योजना तैयार नहीं कर पाई है।
ब्लाक के सुदूरवर्ती गांव सर्दियों में अधिकांशत: बर्फ से ढके रहते हैं। ऐसे में यहां लकड़ी और पत्थर से बने वातानुकूलित मकानों का प्रचलन ज्यादा है। ओसला, पवाणी, सौड़, गंगाड़, भितरी, लिवाड़ी, फिताड़ी आदि दर्जनों गांवों में आज भी अधिकांश मकान लकड़ी के बने हुए हैं।
मवेशियों के साथ स्वयं के रहने के लिए बने इन बहुमंजिला भवनों में ग्रामीण सर्दियों के लिए जलौनी लकड़ी और पशुओं के लिए सूखे चारे का भंडारण भी करते हैं। हल्की सी चिंगारी ही इन मकानों को जला देती है। यही कारण है कि बीते पांच सालों में ही आग लगने की सात घटनाओं में एक सौ से ज्यादा बहुमंजिले मकान स्वाह हो चुके हैं।
दिसंबर 2011 में पैंसर गांव में लगी आग में 14 बहुमंजिला मकान स्वाह होने से दो दर्जन से ज्यादा परिवार बेघर हो गए। नवंबर 2013 में सुनकुंडी, दिसंबर 2014 और मई 2015 में जखोल तथा जनवरी 2016 में भितरी गांव में आग लगने से दर्जनों बहुमंजिले मकान राख हो गए।
सड़क मार्ग से कई किमी पैदल दूरी वाले इन गांवों में आग पर काबू पाने का कोई इंतजाम नहीं है। आग लगने के कारण जगजाहिर होने के बावजूद रोकथाम के उपाय करने के बजाय सरकारी तंत्र की भूमिका सिर्फ पीड़ित ग्रामीणों को थोड़ा बहुत मुआवजा देने तक ही सीमित है।