देश विभाजन के बाद पाकिस्तान और जम्मू कश्मीर के अशांत भारतीय सीमा क्षेत्र से रोजगार की तलाश में यहां आए दो परिवारों के सामने एक और पलायन की पीड़ा से गुजरने का संकट मंडरा रहा है। वर्ष 2010 में आपदा और गंगोत्री हाईवे पर यातायात बहाली में इन दोनों परिवारों को अपने चार मंजिलें मकान एवं कारोबारी ठिकाने गवांने पड़े थे। छह साल बीतने पर भी इन्हें न तो मुआवजा मिला और न ही रोजगार के लिए कोई सहारा।
पाकिस्तान से शरणार्थी बनकर आए भूषण लाल ने भटवाड़ी में चार मंजिला मकान और दुकानें बनाकर कारोबार जमाया। यही स्थिति हबीब बट्ट की थी। वर्ष 2010 की आपदा के दौरान गंगोत्री हाईवे पर यातायात बहाली के लिए बीआरओ के डोजरों से मलबा उड़ेलने से दोनों परिवारों के मकान नींव समेत भागीरथी की ओर सरक गए। आपदा से पहले भी दोनों मकान बीआरओ द्वारा सड़क चौड़ीकरण में चिह्नित किए गए थे।
हबीब बट्ट का परिवार जल विद्युत निगम की कालोनी में शरण लिए हुए है। तीनों बेटों के पास न तो रोजगार का ठिकाना बचा और न ही पूंजी। प्रशासन ने उन्हें मुख्यमंत्री राहत कोष से 65 हजार रुपये देने चाहे, लेकिन इन्होंने लेने से इंकार कर दिया।
भूषण लाल भी अपने पुराने घर में चले गए। तीनों बेटे रोजगार की तलाश में बाहर चले गए। भूषण लाल एवं हबीब बट्ट का कहना है कि प्रशासन ने मकान वाली जमीन का 1.48 लाख रुपये प्रति परिवार मुआवजा बनाया है, लेकिन वे इसे नहीं लेंगे।
आंदोलनों के बाद भी नहीं हो रही सुनवाई
पद्मा देवी, मनोज, प्रकाश लाल एवं शिव स्वरूप के मकान भी आपदा में क्षतिग्रस्त हुए। प्रभावितों द्वारा कई बार भूख हड़ताल एवं धरना प्रदर्शन करने पर प्रशासन ने लोनिवि से क्षतिग्रस्त परिसंपत्तियों का मूल्यांकन कराकर प्रतिकर के लिए फाइल बीआरओ को सौंपी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।