सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जा करने वालों के लिए पालिका आदर्श बनी हुई है। यहां तक कि सार्वजनिक पेयजल टंकी पर भी कब्जा कर निर्माण हो रहा है।
यही नहीं कांजी हाउस को तुड़वाकर भी वहां पर एक तीन मंजिला मकान बना दिया है। कब्जेधारी कोई ओर नहीं, बल्कि पालिका के ही कर्मचारी हैं।
सड़क, गली एवं चौराहों पर अवैध खोखों का साम्राज्य खड़ा होने के साथ ही खाली पड़ी सरकारी जमीनें भी अतिक्रमणकारियों के निशाने पर हैं।
बस अड्डे पर गंगोत्री हाईवे के किनारे बनी जियो ग्रिड वाल के पीछे जमा मलबा निकालने के लिए छोड़े गए रास्ते पर पालिका के ही एक कर्मचारी ने दो मंजिला मकान खड़ा कर दिया।
यही कारण रहा कि बीते साल यहां कचरा डंपिंग जोन बनाने के लिए पीछे की ओर से दीवार तोड़कर रास्ता बनाना पड़ा। भैरवचौक के निकट कंडार देवता मंदिर के सामने सार्वजनिक पानी की टंकी को कब्जा कर निजी भवन खड़े कर दिए गए।
कुछ साल पहले पालिका ने केदारघाट पर लावारिस पशुओं के लिए बने कांजी हाउस को तुड़वाकर यहां एक तीन मंजिला मकान का निर्माण कराया था। इसके पीछे बची खाली जमीन पर भी पालिका के ही एक कर्मचारी ने कब्जा कर लिया।
आजकल इस पर बहुमंजिला भवन का निर्माण चल रहा है। गंगा नदी से महज बीस मीटर दूरी पर निर्माण की अनुमति मिलने पर भी सवाल उठ रहे हैं।
इसके अलावा भी पालिका क्षेत्र में पालिका और प्रशासन की नाक के नीचे कई जगह कायदे कानूनों को ताक पर रखकर अवैध निर्माण हो रहे हैं। नगर के आमोद सिंह, हरी सिंह, चतर सिंह आदि ने पालिका क्षेत्र में सरकारी जमीनों पर हो रहे अवैध कब्जों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की है।
जगह नहीं मिलने पर सरेंडर किया बजट
वर्ष 2003 में वरुणावत भूस्खलन में तबाह हुए पालिका के शॉपिंग कांप्लैक्स एवं कर्मचारी आवास के लिए पालिका को वरुणावत पैकेज में 1.61 करोड़ रुपये मिले थे।
इसमें पालिका ने 59 लाख रुपये में कर्मचारी आवास तो बनाए, लेकिन शॉपिंग कांप्लैक्स का 1.02 करोड़ रुपये इसलिए सरेंडर कर दिया गया कि भवन बनाने के लिए पालिका को जगह नहीं मिली। ऐसे में नगर में बढ़ते अतिक्रमण में पालिका की भूमिका पर सवाल उठने लाजमी हैं।
गंगा किनारे निर्माण पर रोक है। केदारघाट के पास इस तरह का कोई निर्माण जानकारी में नहीं है। इसकी पड़ताल कर मामले में कार्रवाई की जाएगी।
विनयशंकर पांडेय, डीएम उत्तरकाशी।