टिहरी बांध की 42 किमी क्षेत्र में फैली झील के टिहरी और उत्तरकाशी जिले के तटवर्ती आबादी क्षेत्र भूधंसाव के साथ ही फसल एवं जन स्वास्थ्य पर जलजनित दुष्प्रभाव की चपेट में हैं। बांध प्रशासन ने अभी तक झील के रिम एरिया की ढंग से मैपिंग तक नहीं की है और न ही बांध की झील के कारण अलग-थलग पड़े प्रभावित क्षेत्र के विकास के लिए कोई मास्टर प्लान तैयार किया गया।
इन स्थितियों को लेकर टीएचडीसी के निदेशक मोहन सिंह रावत गांववासी का कहना है कि उत्तराखंड सरकार को टिहरी डैम की कमाई से हिस्सा लेने वाली उत्तरप्रदेश एवं केंद्र सरकार के साथ एक हाईपावर कमेटी बनाकर प्रभावित क्षेत्र के लिए विकास योजना तैयार करनी चाहिए।
उत्तरकाशी के दौरे पर आए टीएचडीसी के निदेशक गांववासी का कहना है कि बांध की झील का पानी पूर्व में प्रभावित क्षेत्र से काफी ऊपर तक पहाड़ी ढाल पर बसे गांवों को प्रभावित कर रहा है।
बड़ी आबादी जमीन में पानी रिसने से सक्रिय भूंधसाव की चपेट में है। उत्तराखंड सरकार अलग राज्य बनने के 15 साल बाद भी परियोजना में अपनी हिस्सेदारी निर्धारित नहीं करवा पाई है।
बांध की झील और इसके चारों ओर के लोग क्षेत्र में सघन वनीकरण तथा रिंग रोड तैयार कर क्षेत्र के पर्यटन विकास की योजना तैयार करने की मांग कर रहे हैं।
वनीकरण भी ऐसा हो, जिसकी लघु वनोपज का फायदा स्थानीय लोगों को मिले। झील किनारे वाले गांवों में ग्रामीणों की सहभागिता से उनकी जमीनों पर बागवानी को बढ़ावा दिया जाए।
ग्रामीण इसके लिए सिंचाई एवं सुरक्षा के इंतजाम की जरूरत बता रहे हैं। गांववासी का कहना है कि पहले केंद्र और राज्य सरकार कोई ठोस योजना बनाए, तो वे टीएचडीसी के सीएसआर मद में प्रभावित क्षेत्र के विकास में योगदान का प्रस्ताव रख सकते हैं।