उत्तरकाशी। लोस चुनाव की सरगर्मियों के बीच एक बार फिर ईको सेंसिटिव जोन का मुद्दा चर्चाओं में है। उत्तरकाशी से गोमुख तक गंगा भागीरथी के दोनों ओर कुल 4179.59 वर्ग किमी क्षेत्र को वर्ष 2012 में ईको सेंसिटिव जोन घोषित कर यहां कड़े पर्यावरण कानून लागू किए गए हैं। अभी तक क्षेत्र में विकास योजनाओं को धरातल पर उतारने के लिए जोनल मास्टर प्लान का अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है, जिससे ऑल वेदर रोड परियोजना पर भी काम शुरू नहीं हो पाया है।
दिसंबर 2012 में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने गजट नोटिफिकेशन जारी कर उत्तरकाशी से गोमुख तक करीब 100 किमी लंबाई में गंगा भागीरथी के दोनों ओर के कुल 4179.59 वर्ग किमी हिस्से को ईको सेंसिटिव जोन घोषित किया था। इस हिस्से में नगर सहित गंगोत्री विधानसभा क्षेत्र के कुल 88 गांव शामिल हैं। कांग्रेस और भाजपा नेताओं ने भी इसे काले कानून की संज्ञा दी, लेकिन यह निरस्त नहीं हुआ।
ईको सेंसिटिव जोन से ऑल वेदर रोड परियोजना भी इस कानून के पेंच में फंस कर रह गई है। ईको सेंसिटिव जोन के कारण उत्तरकाशी से गंगोत्री तक हाईवे को चौड़ा करने की अनुमति नहीं मिल पाई है। आपदा से आया रेत-बजरी-पत्थर का मलबा गंगा भागीरथी के प्रवाह पथ में जमा है, जिससे गंगोत्री धाम समेत तमाम तटवर्ती बस्तियों पर खतरा मंडरा रहा है। लेकिन ईको सेंसिटिव जोन की बंदिश के चलते यहां खनन और चुगान प्रतिबंधित है। इस कानून के गजट नोटिफिकेशन के अनुसार सरकार को क्षेत्र में विकास योजनाओं के लिए जोनल मास्टर प्लान तैयार करना था। कानून लागू हुए सात साल पूरे होने को है, लेकिन अभी तक इसको अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है।
भटवाड़ी क्षेत्र के कमल सिंह रावत, मोहन सिंह राणा, जय भगवान पंवार का कहना है कि गंगा एवं पर्यावरण संरक्षण के नाम पर ईको सेंसिटिव जोन की बंदिशें क्षेत्र पर थोपी गई हैं, जबकि क्षेत्र में पर्यावरण देश के अन्य हिस्सों की तुलना में ज्यादा समृद्ध है और गंगा भागीरथी स्वच्छ एवं निर्मल है। कानून से क्षेत्र का विकास प्रभावित हो रहा है, जब सरकार की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं को ही कानून की वजह से स्वीकृति नहीं मिल रही है।