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खेतों की चकबंदी कर गौरा देवी ने तैयार किया खेती-बागवानी से स्वरोजगार का मॉडल

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बड़कोट (उत्तरकाशी)। सरकारी फाइलों व भाषणों तक सिमटे पर्वतीय क्षेत्रों की महिलाओं के सशक्तीकरण के स्वप्न को डख्याटगांव की गौरा देवी धरातल पर साकार कर रही है। 60 वर्षीय निरक्षर महिला लगन व कड़ी मेहनत के बल पर आज बागवानी से लाखों रुपये की आमदनी कर रही है।
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डख्याटगांव निवासी अवतार सिंह जयाड़ा अपनी पत्नी गौरा देवी के साथ खेतीबाड़ी करके परिवार का भरण पोषण करते थे, जबकि उनका इकलौता बेटा भूपेंद्र टैक्सी चलाता था, लेकिन 12 साल पहले बेटे की सड़क हादसे में मौत हो गई। बेटे की मौत ने पिता का हौसला तोड़ दिया। बुजुर्ग दंपति के लिए अपनी दो बहुओं, 6 पोतियों व दो पोतों समेत भरेपूरे परिवार का पेट पालना मुश्किल हो गया। इन हालात में गौरा देवी ने आगे बढ़कर परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली। इसके लिए उन्होंने खेतीबाड़ी को हथियार बनाते हुए सबसे पहले अपने बिखरे हुए खेतों की चकबंदी की। अपनी सुविधाजनक बिखरी हुई जमीन का संटवारा कर दूरस्थ कंडारा तोक में करीब 70 नाली का चक तैयार किया, जहां पारंपरिक फसलों की खेती के साथ ही उन्होंने आडू, प्लम, बादाम, खुमानी, नींबू आदि की बागवानी भी शुरू की। आय बढ़ाने के लिए गौरा देवी ने पशुपालन भी शुरू किया। पशुओं के लिए चारापत्ती एकत्र करने में लगने वाले समय व मेहनत बचाने के लिए उन्होंने बांज, बुरांस आदि चारापत्ती के पेड़ भी अपनी जमीन पर उगाए।
कई सालों के कड़े संघर्ष के दम पर गौरा देवी आज अपनी करीब 80 नाली जमीन पर खेती बागवानी व पशुपालन से सालाना लाखों की आय अर्जित कर रही हैं, जिससे वह परिवार की तमाम जरूरतें पूरा करने के साथ ही अपने पोती-पोतों को उच्च शिक्षा भी दिला रही है। पारिवारिक मोर्चे में सफलता हासिल करने के साथ ही गौरा देवी सामाजिक सरोकारों से भी निरंतर जुड़ी हुई हैं। क्षेत्र में शराबबंदी आंदोलन हो या महाविद्यालय के भवन निर्माण की मांग, सभी मोर्चों पर उन्होंने आंदोलनों का नेतृत्व किया। व्यवहारिक ज्ञान और स्वयं को साबित करने का ही परिणाम है कि नाम लिखने भर की साक्षर गौरा देवी बड़कोट डिग्री कालेज में अभिभावक शिक्षक संघ की अध्यक्ष हैं। गौरा देवी के जज्बे और विपरीत हालात से जूझने की प्रवृत्ति के चलते क्षेत्र में उन्हें ‘लोखर की बिटमाण’ (लोहा महिला) के नाम से पुकारते हैं। गौरा देवी का कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में तमाम दुश्वारियां हैं, तो प्रकृति ने यहां जमकर नेमतें भी बिखेरी हैं। दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ मेहनत की जाए, तो अच्छे परिणाम मिलना निश्चित है। पलायन करके शहरों की ओर जाने से बेहतर है कि अपने गांवों में ही मेहनत कर आजीविका के साथ ही सुख सुविधा के साधन जुटाए जाए।
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