उत्तरकाशी। दशकों पूर्व स्थापित भटवाड़ी तहसील में खोले गए सरकारी कार्यालय एक के बाद एक बंद कर जिला मुख्यालय पलायन कर गए हैं, जिससे ग्रामीण छोटे-छोटे कार्यों के लिए जिला मुख्यालय की दौड़ लगाने को मजबूर हैं।
टिहरी से अलग होकर वर्ष 1960 में उत्तरकाशी जनपद गठन के साथ ही भटवाड़ी को तहसील का दर्जा दिया गया था। बुजुर्ग हरिशंकर रतूड़ी, रतन सिंह बताते हैं कि संयुक्त उत्तर प्रदेश के समय सभी अधिकारी-कर्मचारी तहसील मुख्यालय पर ही रहते थे। क्षेत्र पंचायत सदस्य राघवानंद नौटियाल, कामेश्वर रतूड़ी, जगदीश शास्त्री ने बताया कि वर्ष 1991 के भूकंप से पहले तक परगना मजिस्ट्रेट भटवाड़ी में ही बैठते थे। भूकंप के बाद एसडीएम जिला मुख्यालय बैठने लगे, तो अधिकांश विभाग यहां से पलायन कर गए। वर्ष 2010 में तहसील भवन भूधंसाव से ध्वस्त होने के बाद तो यहां तहसीलदार आदि अधिकारी एवं कर्मचारियों ने भी आना छोड़ दिया है। अब यहां सिर्फ लोनिवि, वन विभाग, ब्लाक, खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय ही रह गए हैं। पांच दशक पूर्व खुले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का अभी तक उच्चीकरण नहीं हो पाया है। यहां प्रसव तक की सुविधा नहीं है। डीएम डा. आशीष चौहान का कहना है कि भटवाड़ी स्थित कार्यालयों में तैनात अधिकारी-कर्मचारियों को अपने दफ्तरों में बैठने के निर्देश दिए गए हैं। एसडीएम भटवाड़ी भी हफ्ते में दो दिन तहसील मुख्यालय पर ही बैठेंगे। निर्देशों का अनुपालन नहीं करने वाले अधिकारी कर्मचारियों के खिलाफ वेतन रोकने आदि की कार्रवाई की जाएगी।
कभी इन विभागों के दफ्तर थे भटवाड़ी में
भटवाड़ी तहसील मुख्यालय पर तहसील एवं विकासखंड कार्यालय के साथ ही वन निगम, उद्योग, खादी ग्रामोद्योग, बाल विकास, जल संस्थान, जल निगम, सिंचाई, ऊर्जा निगम, जड़ी-बूटी, उद्यान, फल प्रसंस्करण, कृषि, समाज कल्याणचर्म उद्योग, एलआईयू, सहकारिता, खाद्य आपूर्ति आदि विभागों के विकासखंड स्तरीय कार्यालय खुले थे। इनमें से अधिकांश विभागों ने अपने दफ्तर जिला मुख्यालय शिफ्ट कर दिए, जो यहां बचे भी हैं उनके अधिकारी-कर्मचारी जिला मुख्यालय पर बैठकर ही काम निपटा रहे हैं।
उग्र आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं भटवाड़ी के ग्रामीण
उत्तरकाशी। भटवाड़ी के सरकारी दफ्तरों को आबाद करने की मांग पर क्षेत्र के ग्रामीण बीते 11 दिन से तहसील परिसर में धरना दे रहे हैं। इस बीच विभिन्न राजनीतिक दलों एवं संगठनों से जुड़े लोग ही नहीं स्वयं परगना मजिस्ट्रेट भी धरना स्थल पर पहुंचकर ग्रामीणों की मांग को जायज बता चुके हैं। प्रमुख राजनीतिक दल भाजपा एवं कांग्रेस के नेता इन हालात के लिए एक दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद बारी-बारी से सत्ता में रहे दोनों ही दलों द्वारा इस दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया।