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स्थानीय उत्पादों से तैयार प्रसाद %आदिभोग% को बढ़ावा मिलने की उम्मीद

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उत्तरकाशी। मुख्यमंत्री की ओर से चारधाम समेत अन्य मंदिरों में स्थानीय उत्पाद से तैयार प्रसाद बिक्री की घोषणा से इस कार्य में लगे समूहों और इनसे जुड़ी महिलाओं के स्वरोजगार की उम्मीदें मजबूत हुई हैं। सीएम ने भले ही अब ‘देवभोग’ नाम से इस प्रसाद की घोषणा की है, लेकिन उत्तरकाशी की एक संस्था वर्ष 2010 से ‘आदिभोग’ नाम से यमुनोत्री धाम में स्थानीय उत्पादों से तैयार प्रसाद को बढ़ावा देने की मुहिम में जुटी है।
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संस्था हिमालय पर्यावरण जड़ी बूटी एग्रो संस्थान जाड़ी ने वर्ष 2010 में यमुनोत्री धाम से लगे बीफ, खरसाली, कुथनौर एवं हलना तथा गंगा घाटी के लदाड़ी गांव में महिलाओं के दस स्वयं सहायता समूह तैयार किए। महिलाओं को केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान मैसूर से प्रशिक्षित प्रशिक्षकों की ओर से प्रशिक्षण दिलाया गया। महिलाओं ने कुट्टू और चौलाई के लड्डू के साथ ही बायोमास कोयले और केदारपाती आदि स्थानीय उत्पादों से धूपबत्ती एवं अगरबत्ती, रिंगाल की कंडी बनाई गई है। प्रसाद में शामिल लड्डू करीब छह माह तक खराब नहीं होता।
संस्था के प्रमुख द्वारिका प्रसाद सेमवाल ने बताया कि सरकार के सहयोग से वर्ष 2014 में खरसाली में पांच लाख रुपये लागत से कलक्शन सेंटर बनाया गया। ‘आदिभोग’ पर करीब 70 रुपये लागत आती है और यह 101 रुपये की दर से तीर्थयात्रियों को बेचा जाता है। यात्रा सीजन के दौरान यमुनोत्री धाम में हर साल करीब डेढ़ लाख रुपये का प्रसाद बिका, जिससे प्राप्त मुनाफा समूह से जुड़ी 75 महिलाओं में बांटा।
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खपत बढ़ने से ही मिलेगा मुनाफा
आदिभोग प्रसाद योजना से जुड़ी लदाड़ी गांव की जमुना देवी, मनमोहिनी गुसाईं, खरसाली की वनिता देवी, हलना गांव की गंगा देवी, बीफ (नारायणपुरी) की गजेंद्री देवी, पार्वती देवी आदि महिलाओं का कहना है कि वे लोग बीते सात साल से स्थानीय उत्पादों से प्रसाद तैयार कर रही हैं, लेकिन अभी तक सरकार का अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने से प्रसाद को बढ़ावा नहीं मिल पा रहा था। अब जब मुख्यमंत्री ने घोषणा की है, तो निश्चित ही इस प्रसाद की खपत बढ़ेगी।
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मंदिर समितियों के सहयोग से ही स्थानीय उत्पादों से तैयार प्रसाद को बढ़ावा दिया जा सकता है। तिरुपति बालाजी आदि देश के विभिन्न बड़े मंदिरों की तर्ज पर स्थानीय उत्पादों से तैयार प्रसाद को बढ़ावा मिला, तो न सिर्फ देश-दुनिया में क्षेत्रीय उत्पादों को अलग पहचान मिलेगी, बल्कि पारंपरिक फसलों के उत्पादन के साथ ही स्थानीय लोगों के लिए स्वरोजगार के अवसर भी तैयार होंगे।
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-द्वारिका प्रसाद सेमवाल, सचिव हिमालय पर्यावरण जड़ी बूटी एग्रो संस्थान उत्तरकाशी।
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