उत्तरकाशी। यमुनोत्री धाम में निर्विरोध संचार एवं मॉनिटिरिंग के लिए जिला प्रशासन की ओर से वायरलेस कम्यूनिकेशन सिस्टम लगाने की योजना बनाई जा रही है। केदारनाथ एवं वैष्णो देवी के तर्ज में लगने वाले इस सिस्टम से प्रशासन को यमुनोत्री पैदल मार्ग की निगरानी में होने के साथ ही यात्रियों को कॉल एवं इंटरनेट की सुविधा मिल सकेगी।
वर्ष 2013 की आपदा के दौरान संचार सुविधा बाधित होने से राहत बचाव कार्यों में काफी परेशानी हुई थी। संचार नहीं होने से प्रशासन को यात्रा मार्गों की स्थिति की सही जानकारी नहीं मिल पा रही थी, जबकि यात्री भी अपने परिजनों से संपर्क नहीं कर पा रहे थे। इसके बाद सरकार की ओर से केदारनाथ में एक वायरलेस कम्यूनिकेशन सिस्टम लगाने के लिए जम्मू की जी-मैक्स आईटी कंपनी को जिम्मा सौंपा गया, जिसने वर्ष 2015 में नाइट वीजन कैमरे, इंटरनेट सिस्टम, खच्चरों पर रेडियो आवृत्ति की पहचान (आरएफआईडी) टैग आदि लगाए।
योजना की सफलता को देखते हुए उत्तराखंड के आपदा सचिव द्वारा अन्य यात्रा मार्गों में भी इस तरह की व्यवस्था तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं, जिसके अंतर्गत जिला प्रशासन एवं कंपनी के सदस्यों की ओर से यमुनोत्री धाम के पांच किमी पैदल मार्ग का सर्वे कर वायरलेस सिस्टम लगाने की योजना तैयार की जा रही है।
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आपदा सचिव की ओर से केदारनाथ में लगे वायरलेस कम्यूनिकेशन सिस्टम की तर्ज पर यमुनोत्री धाम में ऐसी व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए हैं। विशेषज्ञों की ओर से सर्वे करने एवं प्रस्ताव देने के बाद कार्रवाई आगे बढ़ाई जाएगी।
- देवेंद्र सिंह पटवाल, जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी।
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कंपनी ने वैष्णो देवी एवं केदारनाथ धाम में यह सिस्टम लगाया है, जिसकी मदद से प्रशासन पूरे यात्रा मार्ग की निगरानी कर रहा है। यात्रियों को कॉल एवं इंटरनेट की सुविधा मिल रही है। यमुनोत्री में भी यह सिस्टम लगाने की योजना है। इसके सर्वे की तैयारी चल रही है। बीएसएनएल से भी वार्ता की जा रही है।
- रोहित सिंह सांब्याल, निदेशक, जी-मैक्स आईटी कंपनी।
वायरलेस सिस्टम के फायदे
वायरलेस सिस्टम के तहत यात्रा पड़ाव में सिमित दूरी पर टॉवर लगाए जाते हैं, जिससे उत्पन्न संचार तंत्र की मदद से कैमरे, इंटरनेट, हॉट लाइन, डिसप्ले स्क्रीन आदि संचालित होते हैं, जिसकी मदद से प्रशासन यात्रा व्यवस्था पर निगरानी रखने सहित जरूरी दिशा निर्देश दे सकता है। नेटवर्क एवं वाईफाई की सुविधा से यात्री निर्विरोध कॉल तथा इंटरनेट का प्रयोग कर सकते हैं। घोड़े खच्चरों पर आरएफआईडी टैग लगने से उनकी स्थिति की जानकारी भी मिलती है।