फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

लोसर के साथ अपनी परंपराओं और संस्कृति को सहेज रहे जाड भोटिया

विज्ञापन
विज्ञापन
उत्तरकाशी। जाड भोटिया समुदाय के लोगों ने बौद्ध पंचाग के अनुसार नए साल के स्वागत में मनाए जाने वाले लोसर पर्व की तैयारियां शुरू कर दी हैं। 16 फरवरी से शुरू हो रहा लोसर पर्व तीन दिन तक मनाया जाएगा। इस पर्व में दीपावली, दशहरा एवं आटे से खेली जाने वाली अनूठी होली भी देखने को मिलेगी।
विज्ञापन

बौद्ध पंचांग के अनुसार हर साल फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा से नए साल का शुभारंभ होता है। जाड भोटिया समुदाय के लोग लोसर पर्व के साथ नए साल का स्वागत करते हैं। जनपद में भारत-चीन सीमा पर स्थित नेलांग एवं जाढ़ूंग गांव से विस्थापित होकर हर्षिल, बगोरी एवं डुंडा में बसे जाड भोटिया समुदाय के लोग पर्व को विशेष उत्साह एवं हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। पहले दिन चीड़ के छिल्लों से बनी मशालें जलाकर दीपावली मनाई जाती है। मशालों को गांव के तिराहे पर विसर्जित कर तमाम बुराइयों के अंत की कामना की जाती है। दूसरे दिन आटे से कैलाश पर्वत और इसके चारों ओर परिक्रमा करते पशु बनाकर इन्हें चावल से बनी छंग का भोग लगाया जाता है। इसके माध्यम से अच्छी खेतीबाड़ी और पशुपालन की कामना की जाती है, जबकि तीसरे दिन आटे से होली खेलकर सुख समृद्धि की कामना की जाती है।
इस दौरान लोग अपने घरों पर लगी पुराने झंडों को हटाकर नए लगाते हैं। झंडों पर पाली भाषा में लिखे मंत्रों के माध्यम से भगवान की आराधना कर आशीर्वाद लिया जाता है। डुंडा गांव के बुजुर्ग नारायण सिंह नेगी बताते हैं कि लोसर के दौरान समुदाय की आराध्य रिंगाली देवी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। पारंपरिक वस्त्रों में सजे लोग रांसो एवं तांदी नृत्य पर जमकर झूमते हैं।
विज्ञापन

क्या है लोसर पर्व
चंद्रमा की परिक्रमा पर आधारित बौद्ध पंचाग में लोसर को नववर्ष का आगमन माना जाता है। तिब्बती भाषा में ‘लो’ का मतलब नया और ‘सर’ का मतलब साल होता है। बौद्ध परंपराओं का पालन करने वाले तिब्बती, भूटानी समुदाय के लोग इस त्योहार को मनाते हैं। इस वर्ष लोसर का पर्व 16 फरवरी से शुरू होगा। तिब्बत में यह त्योहार 15 दिन तक चलता है, लेकिन उत्तरकाशी सहित कुछ अन्य स्थानों पर अब केवल तीन दिन तक ही पर्व को मनाया जाता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें