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आलू का आटा बदल सकता है उतरकाशी जिले में किसानों की तकदीर

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उत्तरकाशी। अपर यमुनोत्री घाटी में मौसम की मार से उत्पादन हानि और गंगोत्री घाटी में सही दाम न मिलने से इस वर्ष आलू ने काश्तकारों को खूब रुलाया है। मुख्य नकदी फसल आलू पर टिकी आजीविका वाले जिले में यदि आर्गेनिक आलू का आटा तैयार करने की तकनीक गांवों तक पहुंचाई जाए, तो यहां का आलू खेतों में ही बर्बाद नहीं होगा।
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आलू को प्रसंस्करित कर आटा तैयार करके चिप्स, बड़ी, सब्जियों की करी एवं अन्य पौष्टिक फास्ट फूड में इस्तेमाल किया जा रहा है। विभिन्न संस्थानों से संपर्क कर आलू पर पिछले 10 सालों से काम कर रहे महाविद्यालय के वनस्पति विज्ञान के डा. अरुण कुमार अग्रवाल के अनुसार पहाड़ी आलू में पानी की मात्रा कम होने के कारण एक क्विंटल आलू से 40 किलो आटा तैयार किया जाता है। यहां आर्गेनिक आलू उत्पादन की परंपरा है, सिर्फ आर्गेनिक बोर्ड में प्रणाम पत्र व विदेशों में निर्यात के लिए अन्य प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ेगा। इसके लिए सरकारी सपोर्ट जरूरी है। सामान्य आलू का आटा बाजार में 200 से 300 रुपये किलो में बिक जाता है, जबकि आर्गेनिक आलू का आटा 700 से 1000 रुपये किलो तक मिलता है। आलू को उबाल कर इन्हें सोलर ड्रायर से सुखाकर और घराट में पिसकर गांव में ही इसका आटा तैयार किया जा सकता है। पर्यावरणविद् एवं एनजीटी के सदस्य चंडी प्रसाद भट्ट ने मुख्य सचिव की अध्यक्षता में आयोजित ईको सेंस्टिव जोन की बैठक में पहाड़ी क्षेत्रों में आलू के आटे को काफी कारगर बताया है। कहा कि आलू के आटे से किसानों को बहुत लाभ मिलेगा।
कोट.......
आलू के आटे का बाजार यात्रा सीजन में यमुनोत्री गंगोत्री व वर्षभर देश तथा विदेश में है। उत्तरकाशी में उनके संस्थान ने पहले आर्गेनिक आलू उत्पादन का प्रयास किया, लेकिन किसान इसका फायदा नहीं समझ पाए। देहरादून में लगी प्रदर्शनी में हरियाणा राज्य के स्टाल में आलू के आटे के उत्पाद लगे थे।
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डा. हिमानंद सेमवाल, सेवानिवृत्त संयुक्त निदेशक बीज एवं जैविक प्रमाणीकरण संस्थान उत्तराखंड।
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