उत्तरकाशी। पहाड़ी लोकगीतों में छुपी गंगा की आवाज को बटोरने के लिए चलाए जा रहे अभियान का दूसरा चरण शुरू हो गया है। इसके तहत हिमालयी पर्यावरण शिक्षा संस्थान में आयोजित कार्यक्रम में मातली, दिलसौड़, अठाली, चिणाखोली, बाड़ाहाट आदि गांवों के प्रतिनिधियों को लोकगीतों के बारे में जानकारी दी गई।
कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व प्रोफेसर अंजली कपिला ने बताया कि अभियान के तहत गंगोत्री से हरिद्वार तक गंगा किनारे बसे गांवों के लोकगीतों की खोज की जा रही है, जिसमें अभी तक 50 गीतों का संग्रह किया भी जा चुका है। पर्यावरणविद् सुरेश भाई ने कहा कि पहाड़ी लोकगीतों में पर्यावरण, खेती, जन समस्याओं के साथ ही गंगा के महत्व को भी प्रस्तुत किया गया है, लेकिन आधुनिकीकरण के दौर में यह गीत गुम हो रहे हैं, जिनको संरक्षित करना बहुत जरूरी है। बैठक में हिमालय सेवा संघ के मनोज पांडे, उत्तराखंड जन जागृति संस्थान के अरण्य रंजन, कन्हैया लाल नौटियाल, कमल स्वरूप बहुगुणा, देवेंद्र बधानी, गीता गैरोला, ओम बधानी, सुरेंद्र पुरी, पवना नौटियाल, ज्ञान माला आदि मौजूद थे।