उत्तरकाशी। दर्वाटॉप ट्रैक पर मुंबई के एक ट्रैकर की मौत ने प्रशासन के ऊपर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यह पहला मौका नहीं जब जिले में किसी ट्रैकर की मौत हुई है। यह हादसे अधिकतर उन पर्यटकों के साथ हुए हैं, जिनके गाइड कागजी कार्रवाई से बचने के लिए चोरी छिपे बगैर परमिशन के निकलते हैं। वहीं, बिना पंजीकरण कराए ही ट्रैकिंग एजेंसी का संचालन कर रहे हैं। लोग भी इन हादसों के लिए जिम्मेदार हैं।
जिले के प्रमुख ट्रैक रूटों पर जाने के लिए कई खुले मार्ग हैं। इन रास्तों पर निगरानी के लिए कोई चौकी नहीं है, जिससे कई गाइड पर्यटकों को चोरी छिपे ले जाते हैं। इन लोगों का न तो कोई पंजीकरण होता है और न ही मेडिकल फिटनेस टेस्ट। ऐसे में हादसा होने पर प्रशासन के पास ट्रैकरों की कोई जानकारी नहीं होती है। हाल ही में हुए दोनों हादसों में ट्रैकर बिना किसी जानकारी के गए थे, जबकि ट्रैकिंग नियमों के अनुसार परमिशन व मेडिकल के साथ ही दल के पास सेटेलाइट फोन, मेडिकल किट, ऑक्सीजन सिलेंडर, प्रशिक्षित गाइड तथा अन्य जीवन रक्षक उपकरण होने चाहिए, लेकिन अधिकतर पर्यटक व अपंजीकृत गाइड इन नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं, जिससे साहसिक पर्यटन के लिए प्रसिद्ध जिले को काफी नकारात्मक प्रभाव झेलना पड़ रहा है। जिला प्रशासन के लचीलेपन के कारण आपदा प्रबंधन, वन विभाग और पुलिस विभाग के पास हर साल हो रही इन ट्रैकर्स की मौत की जानकारी तक नहीं है।
बॉक्स:
बीते कुछ सालों में हुई मौतें
- 1996 में भागीरथी तथा केदारडोम चोटियों में 3
-2004 में गंगोत्री पीक व कालंदी पास में 8
-2005 चौखंभा पीक में 5
-2008 में कालंदी पास में 8
-2012 में वासुकी ताल में 5
-2013 में गोमुख के पास 1
-2016 में शिवलिंग तथा गौमुख के पास 3
-2017 में क्यारकोटी तथा दर्वाटॉप में 2
कोट:
प्रशासन को पंजीकृत एजेंसियों को सेटेलाइट फोन उपल्बध कराने चाहिए। पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। लंबे ट्रैक पर जाने वाले हर व्यक्ति का मेडिकल टेस्ट होना चाहिए। -जयेंद्र राणा, अध्यक्ष, गढ़वाल हिमालय ट्रैकिंग एंड माउंटेनियरिंग एसोसिएशन
ट्रैकिंग नियमों को लेकर कठोर कदम उठाने की तैयारी की जा रही है। ट्रैकिंग एसोसिएशन व वन विभाग के साथ मिलकर प्लान तैयार किया जाएगा। पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ ही यात्रियों की सुरक्षा भी जरूरी है। - डा. आशीष चौहान, जिलाधिकारी, उत्तरकाशी।