बड़कोट (उत्तरकाशी)। यमुनोत्री धाम से 14 किमी दूर और समुद्र तल से 16500 फीट की ऊंचाई पर स्थित सप्तऋषि कुंड शासन-प्रशासन की अनदेखी और प्रचार प्रसार के अभाव में पर्यटकों कोे अपनी तरफ नहीं खींच पाया है। ग्लेशियर, बुग्याल, ब्रह्म कमल आदि प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस स्थान की अनदेखी से शासन प्रशासन की कार्यप्रणाली का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस स्थान पर जाने के लिए कई पर्यटक एवं एडवेंचर प्रेमी उत्साहित रहते हैं, परंतु कोई स्थायी ट्रेक न होने की वजह से वे यहां तक पहुंच ही नहीं पाते हैं। यमुनोत्री मंदिर समिति के जगमोहन उनियाल के अनुसार प्राकृतिक सुंदरता के अलावा इस स्थान का पौराणिक महत्व भी है। मान्यता के अनुसार जब यमुना नदी गो लोक से निकलकर पृथ्वी पर उतर रहीं थीं तो उनके वेग से तबाही होने का डर पैदा हो गया था। इसे रोकने के लिए ऋषियों ने उन्हें जामुन के पेड़ पर थाम लिया। इस पेड़ पर बड़े आकार का एक ही फल होता है, जो कुंड में गिरकर यमुना की धारा को आगे बढ़ाता है। इसी वजह से यमुना को जमुना नदी भी कहते हैं। माना जाता है कि केवल पवित्र मन वाले लोगों को ही यह अदृश्य पेड़ दिखाई देता है।
क्षेत्र निवासी मनमोहन उनियाल का कहना है कि उत्तर प्रदेश के वक्त वन विभाग को इस स्थान पर ट्रेक रूट बनाने के लिए बजट आवंटित हुआ था, परंतु राज्य बनने के बाद ये कार्य अधर में लटक गया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार एवं प्रशासन द्वारा पर्यटन विकास के लिए कई घोषणाएं की जाती हैं, परंतु जमीनी हकीकत कुछ और ही है। यमुनोत्री क्षेत्र में धिनाडा बुग्याल, भीम टॉप, संगासू, धरा टॉप जैसे कई पर्यटक स्थल हैं। लेकिन प्रशासन की अनदेखी के चलते यहां का पर्यटन विकास नहीं हो पाया है। डीएफओ जेपी सिंह कहते हैं कि विभाग को सप्तऋषि कुंड सहित किसी भी ट्रेक रूट के विकास के लिए कोई बजट नहीं मिला है। हालांकि इस संबंध में शासन में प्रस्ताव भेजा है।