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उत्तराखंड के राज्यपाल पर भारी पड़ सकते हैं 10 दिन

Sun, 27 Mar 2016 01:44 PM IST
अजित सिंह राठी/ अमर उजाला, देहरादून
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केके पॉल - फोटो : AmarUjala
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उत्तराखंड के संवैधानिक प्रमुख व राज्यपाल डॉ. कृष्णकांत पाल को कांग्रेस को बहुमत साबित करने के लिए 10 दिन का समय देने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। जिस दिन से राज्यपाल ने हरीश रावत को बहुमत साबित करने के लिए पर्याप्त समय दिया, उसी दिन से वह भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के निशाने पर आ गए हैं। भाजपा के बड़े नेताओं की मानें तो अगले महीने तक राज्यपाल को हटाया या स्थानांतरित किया जा सकता है।
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विगत 18 मार्च को विधानसभा के भीतर हुए राजनीतिक ड्रामे के बाद राज्यपाल डॉ. कृष्णकांत पाल ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर 28 मार्च तक बहुमत साबित करने को कहा। जैसे ही राज्यपाल ने बहुमत की मियाद मुख्यमंत्री को दी, उसी दिन विधानसभाध्यक्ष ने कांग्रेस के बागी नौ विधायकों को 26 मार्च तक अपना जवाब दाखिल करने का नोटिस जारी कर दिया।

तारीखों के इस फेर ने भाजपा के हाथ में आई बाजी को पलट दिया। इसके बाद चर्चा रही कि यूपी के गवर्नर राम नाईक को उत्तराखंड का अतिरिक्त चार्ज दिए जा रहा है। सूत्रों की मानें तो इसकी तैयारी भी थी, लेकिन भाजपा के ही एक खेमे ने इसका विरोध किया और कहा कि यदि राज्यपाल को अभी हटाया गया तो इसका विपरीत असर पड़ेगा।
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राज्यपाल द्वारा अगले ही दिन 20 मार्च को मुख्यमंत्री को एक चिट्ठी भेजकर कहा गया कि जितनी जल्दी हो सके बहुमत साबित करें। इस दूसरे पत्र के कई निहितार्थ निकाले गए। इस पत्र को भाजपा की सेंट्रल लीडरशिप की नाराजगी और एक दिन पहले दिल्ली में राज्यपाल को बदलने को लेकर हुई चर्चा से जोड़कर देखा गया।

हालांकि यह बात भी दीगर है कि राज्यपाल का निर्णय संवैधानिक तौर पर ठीक था, लेकिन भाजपा की सेंट्रल लीडरशिप इस बात को लेकर नाराज थी कि जब 36 विधायकों ने राजभवन में परेड की तो फिर इतना लंबा समय देना का क्या औचित्य था। भाजपा के एक दो केंद्रीय नेता तो यह दावा कर रहे हैं कि सरकार रहे या ना रहे, लेकिन राज्यपाल बदलना तय है।

राज्यपाल ने 23 मार्च को विधानसभाध्यक्ष को भेजे पत्र में बहुमत के दौरान शांतिपूर्ण तरीके से कराने के लिए कहा। ताकि लोकतांत्रिक मूल्य बचे रहे। मतदान के नतीजे तत्काल घोषित हो और पूरी कार्यवाही की रिकॉर्डिंग हो। क्योंकि कुछ विधायकों का यह कहना था कि वित्त विनियोग विधेयक के पारित होने के दौरान उनके मतों की गणना नहीं की गई और उनके अधिकारों से उन्हें वंचित रखा गया। इस चिट्ठी को भी उसी क्रम में देखा गया। 

नेतृत्व परिवर्तन का विकल्प भी उभरा
कथित स्टिंग आने के बाद कांग्रेस में कई तरह की चर्चाएं हैं। माना जा रहा है कि कांग्रेस आलाकमान उत्तराखंड को हाथ से निकलने देने के बजाय नेतृत्व परिवर्तन पर विचार कर सकता है। क्योंकि आज का कथित स्टिंग कांग्रेस की रणनीति को कहीं न कहीं कमजोर कर गया है।

इसलिए माना जा रहा है कि यदि कांग्रेस अपने इस प्रदेश को बचाना चाहेगी तो उसके सामने नेतृत्व परिवर्तन भी एक बड़ा विकल्प है। अभी तक तो ऐसी कोई तैयारी नहीं दिखी थी, लेकिन इस स्टिंग के बाद हालात तेजी से बदले हैं। इस संभावित विकल्प के रूप में विजय बहुगुणा वापसी करेंगे या फिर संसदीय कार्यमंत्री इंदिरा ह्दयेश को ताज सौंपा जा सकता है, यह अभी भविष्य के गर्भ में है।
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