मातमी माहौल और मायूसी के घुप्प अंधेरे में भी उम्मीद का दीया टिमटिमा रहा है। केदारनाथ में जलप्रलय के बाद से लापता हुए कई लोगों के परिजनों को अभी भी उनके जिंदा होने की आस है। लोग अभी भी अखबारों के दफ्तरों और सरकारी कार्यालयों में फोन कर अपनों की सुध लेने के लिए भटक रहे हैं।
ऐसे लोगों की मदद के लिए अगस्त्यमुनि की प्रकृति संस्था की टीम उनके द्वारा बताए गए स्थानों पर खोजबीन के लिए गई, लेकिन नदी पार करने का कोई साधन नहीं होने पर टीम आगे नहीं जा पाई।
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दिल्ली निवासी अधिवक्ता जितेंद्र मेहता ने ‘अमर उजाला’ में फोन कर बताया कि आपदा के समय से उनके पिता सीताराम मेहता सहित करनाल ग्रुप के 12 लोग लापता हैं। उन्होंने बताया कि करीब 10 दिन पूर्व उनको हरियाणा से सोनू नाम के एक व्यक्ति का फोन आया कि उसने उनके पिता के पूरे ग्रुप को देखा है।
वे लोग मद्महेश्वर घाटी के गौंडार गांव के जंगलों में थे। वह भी वहीं फंस गए थे। उसने अपने दस साथियों के साथ गौंडार में नदी पार कर ली थी, लेकिन उसके पिता का ग्रुप नदी पार नहीं कर पाया। सोनू ने केदारनाथ भंडारे में खाना खाया था, इसलिए उनकी पहचान कर पाया।
किसी ने गंभीरता से नहीं लिया
जितेंद्र ने बताया कि उसने उत्तराखंड शासन-प्रशासन को इस बारे में बताया, तो किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। ऐसे में अगस्त्यमुनि की प्रकृति संस्था ने ग्रुप को ढूंढने के लिए गौंडार गांव के समीप रांसी गांव के कुछ युवकों को सोनू द्वारा बताए गए स्थान पर भेजा। युवकों ने बताया कि नदी पार करने का कोई साधन नहीं होने के कारण वह दूसरी ओर नहीं जा पाए, लेेकिन उन्हें दूसरी ओर कोई नहीं दिखाई दिया। संस्था ने शुक्रवार को दोबारा टीम को उक्त स्थान पर भेजा है।
दिल्ली से फोन आया था, लेकिन सूचना अपुष्ट लग रही है। अलबत्ता चॉपर से रांसी-गौंडार के जंगलों की रेकी करने की कोशिश की जाएगी।
-मीरा कैंतुरा, जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी, रुद्रप्रयाग
हमें जैसे ही सूचना मिली, हमने रांसी गांव के युवकों की हेल्प ली। पांच सदस्यीय पर्वतारोहियों की टीम गोपेश्वर के रास्ते ऊखीमठ भेजी गई है। ताकि किसी के जीवित मिलने का संकेत मिलने पर टीम को सही मार्ग से रवाना किया जा सके।
-गजेंद्र रौतेला, सचिव प्रकृति संस्था
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