दो दिन तक जंगलों में घास चबाकर किसी तरह जिंदगी बचायी। सोचा जिस भगवान ने हमको मुश्किल में डाला, अब वही हमें बचने का रास्ता भी बताएगा। यह आपबीती जीने की आस लिये गौरीकुंड से 90 किमी पैदल रुद्रप्रयाग पहुंचे चमोली जिले और नेपाल के 150 लोगों ने बयां की।
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गौरीकुंड कार पार्किंग में एक कैंटीन में खाना बनाने वाले पुष्कर चौहान (खाल सरमोला जिला चमोली) बताते हैं कि हम तीन लोग कमरे में थे। 15 जून की शाम लगभग छह बजे तेज गड़गड़ाहट हुई। हम कैंटीन छोड़ गौरीकुंड के ऊपर चले गए। 10 मिनट में पूरी पार्किंग बह गई। हम किसी तरह गौरीगांव पहुंचे। यहां रात दो बजे तक हम एक कमरे में रहे। रात में फिर शोर हुआ कि भूस्खलन हो रहा है भागो।
जान बचाने के लिए जंगल में भाग गए
हम रात में गांव से दो किमी ऊपर जंगल में चले गए। 16 जून की सुबह फिर गौरीगांव आए, लेकिन सूचना मिली की रामबाड़ा में झील टूट गई है। हम जान बचाने के लिए जंगल में भाग गए। 17 जून की सुबह हम जंगल से सोनप्रयाग की ओर चल दिए। 17 की रात हमने मुंडकटिया में एक गोशाला में बिताई। 18 से हमने आगे चलने का फैसला किया। सोनप्रयाग पावर हाउस के समीप पुल तो बह गया था, लेकिन नदी के दोनों ओर एक पेड़ फंसा हुआ था। जिस पर सैकड़ों लोगों ने सरक-सरक कर नदी पार की।
किसी तरह हम साथी विजय पंत के मामा के घर फाटा पहुंचे। 19 जून सुबह फाटा से चल दिए और मैंखंडा, गुप्तकाशी, लमगौंडी, बसुकेदार, डडोली, चाका होते हुए पंदरोला गांव पहुंचे। यहां से रामपुर झूला पुल से दूसरी छोर पहुंचे और फिर किसी तरह जंगलों के रास्तों से रुद्रप्रयाग पहुंचे।
ऐसी ही दास्तान घोड़ा चलाने वाले रोशांग गांव (थराली चमोली) के जयवीर, रोशन और नेपाल निवासी गणेश बहादुर, राम बहादुर की भी है। उन्होंने गौरीगांव के ऊपर जंगल में दो रात बिताई।