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कुदरती कहर के बाद दिखे इंसानी फितरत के कई रुप

Thu, 20 Jun 2013 04:44 PM IST
रुद्रप्रयाग/लखपत रावत
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केदारघाटी में आई आपदा ने इंसानी फितरत के कई रुप सामने कर दिए हैं। इन दिनों आपदा प्रभावित क्षेत्रों में सकुशल वापस लौटे लोगों की आपबीती सुनकर एक ही क्षेत्र के दो पक्ष सामने दिख रहे हैं। जिसने इस कहावत को चरित्रार्थ कर दिया है कि एक पेड़ के सभी फल एक समान नहीं होते हैं।
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पहला पक्ष इंसानी फितरत के घिनौने चेहरे लोभी का है। जिसका नजारा इन दिनों गौरी गांव में दिखाई दे रहा है। यहां पर आपदा के कारण फंसे लोगों को मदद करने के बजाए उन्हें लूटा जा रहा है। कुछ स्थानीय लोग मदद करने के एवज में लोगों से पैसे ले रहे हैं।

हवाई सेवाओं के जरिए फेंके जा रहे फूड पैकेट को भी कब्जे में करके बेच रहे हैं। वहीं कुछ नेपाली मजदूरों द्वारा तीर्थ यात्रियों के जेवरात, कपड़े व सामान लूटने की घटना भी प्रकाश में आई है। आपदा प्रभावित जगदीश रोशन ने बताया कि गौरी गांव में बिना पैसों वालों को कोई पूछ नहीं रहे हैं। एक छोटी मदद करने के लिए भी हजार रुपये तक मांग रहे हैं।
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कुछ लोग मदद भी कर रहे हैं
ये तो था इंसानी फितरत का घिनौना चेहरा, लेकिन क्षेत्र में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अतिथि देवों भव: की कल्पना को चरित्रार्थ कर रहे हैं। ऐसे ही एक इंसान है पावर हाऊस सोनप्रयाग में तैनात दर्शन लाल गैरोला। अतिवृष्टि व मंदाकिनी नदी में आई बाढ़ के कारण 17 जून को लगभग तीन हजार तीर्थ यात्री सोनप्रयाग व मुंडकट्या के बीच फंस गए।

सोन गंगा नदी का पुल बहने से फंसे लोगों को नदी पार करने में दिक्कतें हो रही थी। बारिश तेज होने से लोग ठंड से कांपने लगे। लोगों की स्थिति को देखते हुए श्री गैरोला का दिल पसीस गया और उन्होंने कुछ साथियों के साथ मिलकर मदद की ठानी। उन्होंने एक रस्सी के सहारे नदी के दूसरे छोर पर खड़े लोगों के पास तक कुल्हाड़ी पहुंचाई और एक बड़ा पेड़ काटने का इशारा किया।

पेड़ काटने के बाद इसे पावर हाऊस से अटका कर अस्थाई पुल बनावाया। जिससे फंसे लोग आर-पार हो पाए। इतना ही नहीं कुछ बेसहारा व असहाय स्थिति में पहुंच चुके लोगों को गैरोला ने स्वयं कंधे में लेकर नदी पार करवाई। इसके बाद लोगों के लिए रहने, कपड़े व खाने की व्यवस्था करवाई। सोनप्रयाग में फंसे पुष्कर चौहान ने बताया कि अगर नदी पर अस्थाई पुल नहीं बनता तो कई लोग ठंड से वहीं पर मर जाते।
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