उन तमाम गांववालों से भूखे-प्यासे और मुसीबत के मारे तीर्थयात्रियों का दुख देखा न गया।
पहले तो आपदा और सैलाब से उनकी जान बचाई, अपने आशियानों में शरण दी और जब उनके सुरक्षित निकलने के रास्ते न बने तो कई दिनों तक घर में जो भी था, खिलाया और उन्हें सकुशल विदा किया।
उत्तराखंड में तबाही का मंजर
तब रत्ती भर भी ये ख्याल न किया कि वे खुद भी आपदा में घिर सकते हैं। राशन-रसद के भंडार खत्म हो गए तो मुसीबत पैदा हो सकती है।
अब देवभूमि के सैकड़ों ऐसे अतिथि सत्कारी गांवों में फाकों की नौबत है। गांव में राशन बचा नहीं और बाहर जाने के सारे रास्ते बंद हैं, दीन-दुनिया से संपर्क कटा है।
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जब राष्ट्रीय और राज्यीय राजमार्ग ही चलने लायक नहीं बन पा रहे हैं तो उनके संपर्क मार्गों का कौन ख्याल करे। राजधानी से ट्रकों राहत सामग्री रवाना तो हो रही है लेकिन न जाने कहां बिला जा रही है।
रसद गिराने वाले हेलीकाप्टरों के निशाने पर भी ये अभागे गांव नहीं आ पा रहे हैं। आइए आपको ले चलते हैं ऐसे ही कुछ गांव।
बदरीनाथ में 2000 यात्री अब भी फंसे
पांडुकेश्वर भूखा है
बदरीनाथ यात्रा के प्रमुख पड़ाव पांडुकेश्वर को आपदा ने छलनी कर दिया। जलप्रलय में तीर्थयात्री फंसे तो जान जोखिम में डालकर लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया और कई दिनों तक उनके भोजन की व्यवस्था की।
यात्री कई दिन यहां फंसे रहे। स्थानीय ग्रामीणों ने उनकी पूरी मदद की। आज इस गांव में रसद का गंभीर संकट है। कोई राहत सामग्री भी यहां नहीं पहुंची है।
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माणा की दरियादिली मानी
चमोली जिले के सीमांत गांव माणा में लोगों ने वहां फंसे तीर्थयात्रियों के लिए भंडारा लगाया।
बदरीनाथ में जब दूर-दूर तक किसी राहत का इंतजाम न हो पाया तो राशन की कमी होने के बावजूद तीर्थयात्रियों के लिए कोई कमी नहीं रखी। आज इस गांव में राशन का संकट है।
तीन किमी दूर बदरीनाथ तक पहुंच रहे अफसर माणा गांववालों से आंखें फेरे हैं।
देखिए तिलवाड़ा का दिल
गुप्तकाशी में महिलाएं फंसे तीर्थयात्रियों के लिए घरों से रोटी बनाकर ले गईं। एक स्कूल में ठहराकर उनके खाने की व्यवस्था की। झोसी गांव में तीर्थयात्रियों के लिए रोज भंडारा लगा।
रुद्रप्रयाग-केदारनाथ हाईवे पर रुद्रप्रयाग से 9 किमी दूर तिलवाड़ा गांव के लोगों ने अपने दुख भूलकर परदेसियों के लिए भंडारे लगाए। अब तिलवाड़ा भी राशन को तरस रहा है।
छह दिन में खत्म छह महीने का भंडार
गौरीकुंड, रामबाड़ा, सीतापुर व सोनप्रयाग में फंसे लोगों को आसरा देने वाले त्रिजुगीनारायण गांव के लोग अब सरकारी मदद के भरोसे हैं।
चार धाम यात्रा शुरू होते ही रोजगार के लिए गांव के पुरुष बाहर चले गए और छह माह का अनाज घर भर गए।
तबाही के बाद यात्रा के प्रमुख पड़ावस्थल सोनप्रयाग के लॉज मालिकों ने तीर्थयात्रियों को त्रिजुगीनारायण गांव भेज दिया।
गौरीकुंड से भी यात्रियों ने निकलकर गौरी गांव में शरण ली। किमाणा, तोशी, मजोशी गांव भी तीर्थयात्रियों से भर गए। हर परिवार ने 10 से 15 लोगों को ठहराया और छह महीने का अपना भंडार उनके लिए छह दिन में ही खाली कर दिया।