काशीपुर। मां बाल सुंदरी देवी के ऐतिहासिक चैती मेले में लगने वाला नखासा बाजार देश के अन्य राज्यों में खास पहचान रखता है। इस बाजार में 10-12 नस्ल के घोड़ों की खरीद-फरोख्त होती है, लेकिन समय के साथ इस बाजार की रौनक अब फीकी पड़ने लगी है।
चैती मेले के नखासा बाजार में कई प्रदेशों से लोग घोड़े खरीदने-बेचने आते हैं। इस बाजार में वर्ष 2018 में ग्राम कचनालगाजी निवासी एक व्यक्ति सिंधी नस्ल का घोड़ा लेकर पहुंचा था जिसकी कीमत उस वक्त 50-55 लाख रुपये आंकी गई थी। मां बाल सुंदरी देवी मंदिर के प्रधान पंडा वंश गोपाल अग्निहोत्री बताते हैं कि चैती मेले का नखासा बाजार लगभग 170 साल पुराना है। उन्होंने बताया कि यहां पर हर नस्ल के घोड़ों की बिक्री होती थी। इनमें पंजाब, राजस्थान और काठियावाड़ी नस्ल खास हुआ करती थी। बीते कई वर्षों से 10-12 नस्ल के घोड़े ही यहां पर आते हैं। उन्होंने बताया कि समय के साथ घोड़ा खरीदारों की संख्या में बहुत कमी आई है। लोगों में अब वह उत्साह भी नहीं है जो आज से 10-15 वर्ष पहले हुआ करता था।
पहले 25 रुपये में भी बिकते थे घोड़े
लगभग पचास साल पहले यहां चैती मेले में 25 रुपये से एक हजार रुपये तक में घोड़े बिकते थे। उस दौरान पंजाबी घोड़े की कीमत एक हजार रुपये तक हुआ करती थी। इस नस्ल के घोड़े को अधिकांश शौकिया लोग ही खरीदकर ले जाते थे। इन घोड़ों का इस्तेमाल सेना में भी होता था। वहीं अब नखासा बाजार में दस हजार से लेकर 3-4 लाख रुपये तक के घोड़े बिकते हैं।
इस बार अब तक नहीं आए घोड़ा व्यापारी
नखासा बाजार में चैती मेला शुरू होने से एक सप्ताह पहले से घोड़ा व्यापारी घोड़े लेकर यहां आने लगते थे और मां का डोला आने के साथ नखासा बाजार बंद हो जाता था। इस वर्ष ऐसा नहीं है। इसकी एक वजह है कि जिस दिन मेला शुरू हो रहा है उस दिन ईद है। वहीं सूत्रों की मानें तो इस बार बहुत कम घोड़ा व्यापारियों के आने की उम्मीद है।
इन नस्ल के घोड़े आते थे बिकने
नखासा बाजार में अवलक, पंचकलिया, कुमैत, सुरंग, बादमी, महुआ सुरंग, सफजा, नीला सफजा, नीला, मुश्की, काला रंग, नुकरा, तैलिया, कुम्मैत नस्ल के घोड़े अधिक बिकने आते थे। वहीं यहां पर पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, कश्मीर, हरियाणा व यूपी से लोग घोड़ा खरीदने पहुंचते थे।