काशीपुर। प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए ''जिग-जैग'' तकनीक अपनाने के बावजूद जिले में ईंट भट्ठा उद्योग की स्थिति बदतर है। कई करों और सरकारी नियमों के बढ़ते दबाव के चलते पिछले पांच वर्षों में 31 ईंट भट्ठे बंद हो चुके हैं अभी भी 12 भट्ठे बंदी के कगार पर हैं।
वर्ष 2020 तक जनपद ऊधमसिंह नगर में 73 ईंट भट्ठे थे। इनमें से 31 भट्ठे अलग-अलग कारणों से बंद हो चुके हैं। वर्तमान में जसपुर में 10, बाजपुर में आठ, गदरपुर में आठ, रुद्रपुर में दो, किच्छा व सितारगंज में तीन-तीन और खटीमा में 10 भट्ठे हैं।
काशीपुर के सभी सात भट्ठे बंद हो चुके हैं। दो तीन साल पहले तक ईंट भट्ठे प्रदूषण की बड़ी वजह बने हुए थे। उनकी चिमनियों से कार्बन युक्त काला धुआं निकलता था। इसके लिए आईआईटी रुड़की ने जिग-जैग तकनीक विकसित की। पीसीबी के दबाव में जिले के सभी 42 भट्ठे जिग-जैग प्रणाली पर आ चुके हैं।
ईंट भट्ठों की स्थिति करों और आर्थिक बोझ के कारण बदहाल है। कोयले और परिवहन पर जीएसटी की दर 5% से बढ़ाकर 18% कर दी गई है। मिट्टी पर रॉयल्टी बढ़ने से भट्ठा मालिकों की उत्पादन लागत काफी हद तक बढ़ गई है। ईंट की बिक्री पर जीएसटी छह फीसदी से बढ़कर 12 फीसदी तक हो गई है।
बढ़ते खर्च से भट्ठों को सालाना पांच से 12 लाख तक का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ रहा है। भट्ठों को अब पर्यावरण स्वीकृति और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुज्ञा भी जरूरी है।
ईंट भट्ठा एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष जगदीश कांबोज का कहना है कि भट्ठा उद्योग को जीवित रखने के लिए एक मुश्त कर प्रणाली लागू की जानी चाहिए। साथ ही सरकार को परिवहन व मिट्टी खनन की रॉयल्टी में छूट संबंधी रियायतें भी देनी होंगी। कांबोज का कहना है कि अभी भट्ठों की माली हालत बहुत खराब है। कई भट्ठा मालिक अपनी लेबर को साप्ताहिक खर्च तक नहीं दे पा रहे हैं।
क्या है जिग-जैग प्रणाली
काशीपुर। आईआईटी रुड़की ने ईंट भट्ठों के लिए प्रदूषण मुक्त जिग-जैग तकनीक विकसित की है। यह पर्यावरण के लिए अनुकूल है। इसमें ईंटों को सीधी कतार के बजाय टेढ़ी-मेढ़ी (सीढ़ीनुमा) पंक्तियों में लगाया जाता है। इसमें ईंधन दस बार सीढ़ियों से होकर गुजरता है जिससे कार्बन ईंटों में जम जाता है। इस तरह कार्बन को ईंधन के तौर पर प्रयोग किया जा सकता है। इससे कोयले की खपत कम होती है और ईंटें अच्छी तरह पकती हैं।