रुद्रपुर। यदि पुलिसकर्मी ही नियमों का उल्लंघन करेंगे और अपनी सुविधा के अनुसार तैनाती पाएंगे तो आम जनता के लिए निष्पक्ष न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है? आईजी रिधिम अग्रवाल के तबादलों के बाद उम्मीद है कि इस तरह की अनियमितताओं पर अंकुश लगाया जाएगा और पुलिस विभाग में सेवा को प्राथमिकता दी जाएगी न कि व्यक्तिगत सुविधा को। यह आवश्यक है कि पहाड़ी जिलों में भी योग्य और समर्पित पुलिसकर्मी अपनी सेवाएं दें ताकि वहां की कानून व्यवस्था मजबूत हो सके।
आईजी रिधिम अग्रवाल के बड़े पैमाने पर तबादलों के बाद अब यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या पुलिसकर्मी पहाड़ की दुर्गम जगहों पर अपनी सेवाएं दे पाएंगे। चिंता का विषय यह है कि अल्मोड़ा, चंपावत और पिथौरागढ़ जैसे पहाड़ी जिलों से वेतन लेने वाले 12 से अधिक इंस्पेक्टर, दरोगा और सिपाही ऊधम सिंह नगर में संबद्धता (डेपुटेशन) के आधार पर सेवाएं दे रहे हैं। पहाड़ में नौकरी करने पर ये पुलिसकर्मी या तो बीमार हैं या उनकी पारिवारिक समस्या है। मगर ऊधम सिंह नगर में आकर थाना-चौकियों के इंचार्ज बनने में कोई गुरेज नहीं है। यह स्थिति पुलिस विभाग में कार्य आवंटन और कर्मियों की तैनाती को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
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क्या कहती है पुलिस नियमावली?
पुलिस नियमावली के अनुसार मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों में सेवा का एक निश्चित अनुपात तय है। इसके तहत एक सिपाही को 16 साल मैदान में और आठ साल पहाड़ में सेवा देनी होती है। वहीं इंस्पेक्टर और दरोगा के लिए यह अवधि आठ साल मैदान और चार साल पहाड़ की होती है। इस नियमावली का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी पुलिसकर्मी विभिन्न भौगोलिक और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में सेवा का अनुभव प्राप्त करें। हालांकि वर्तमान स्थिति इस नियमावली के उद्देश्य पर ही पानी फेरती नजर आ रही है।
पुलिस नियमावली के अनुसार कर्मियों को तैनाती दी जाती है। अपरिहार्य कारणों में संबद्धता का प्रावधान है। संबद्धता के संबंध में जानकारी जुटाई जाएगी। -डॉ. वी मुरुगेशन, एडीजी, अपराध एवं कानून व्यवस्था।