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31 साल बाद: आज भी हर उत्तराखंडी की आंखों में तैर रहा वो काला दिन, खटीमा गोलीकांड में सात लोग हुए थे शहीद

Mon, 01 Sep 2025 02:35 PM IST
हीरा मेहरा अमर उजाला नेटवर्क, ऊधम सिंह नगर

सार

आज खटीमा गोलीकांड की 31वीं बरसी है। एक सितंबर 1994 को पृथक राज्य की मांग के लिए खटीमा की सड़कों पर उमड़े राज्य राज्य आंदोलनकारियों पर पुलिस ने गोलियां बरसा दी थीं। इसमें सात लोगों के शहीद होने के साथ ही 165 से अधिक गंभीर रूप से घायल हुए।
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खटीमा गोलीकांड के शहीद आंदोलनकारियों को श्रद्धांजलि - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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आज उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान हुए खटीमा गोलीकांड की 31वीं बरसी है। एक सितंबर 1994 को पृथक राज्य की मांग के लिए खटीमा की सड़कों पर उमड़े राज्य राज्य आंदोलनकारियों पर पुलिस ने गोलियां बरसा दी थीं। इसमें सात लोगों के शहीद होने के साथ ही 165 से अधिक गंभीर रूप से घायल हुए।

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खटीमा गोलीकांड को याद करते ही आज भी उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी कल्याण परिषद के पूर्व उपाध्यक्ष कैप्टन शेर सिंह दिगारी के कानों में गोलियों की तड़तड़ाहट, पुलिस की लाठियों की आवाज और जनता की चीख पुकार गूंजने लगती है। कनालीछीना, पिथौरागढ़ निवासी कैप्टन दिगारी बताते हैं कि वर्ष 1959 को तीन कुमाऊं रेजिमेंट में सिपाही के रूप में भर्ती होने के बाद वह ऑर्डिनरी कैप्टन के रूप में वर्ष 1988 को सेवानिवृत्त हुए। उसके बाद वह डीएससी में चले गए थे। जुलाई 1994 को डीएससी से रिटायर्ड होने के दो माह बाद ही खटीमा गोलीकांड हो गया था। उस दिन रामलीला मैदान में करीब 10 हजार लोगों का जुलूस पृथक राज्य मांग करता हुआ सितारगंज रोड की ओर बढ़ा और फिर लौटकर कोतवाली के गेट से निकल रहा था। इसी दौरान पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी। जिसमें सात लोगों के शहीद होने के साथ ही कई लोग घायल हुए। घायलों में वह भी शामिल थे। वह आंदोलन एक जनक्रांति की तरह था।

पुलिस ने कई राज्य आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया। वह भी जेल में रहे। इसके खटीमा से उठी राज्य आंदोलन की चिंगारी पूरे राज्य तत्कालीन यूपी में फैल गई। अगले दिन दो सितंबर को मसूरी में भी पुलिस की गोलीबारी में छह लोग शहीद हुए। 
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खटीमा गोलीकांड के बाद ही उत्तराखंड राज्य आंदोलन में तेजी आई, जिसके परिणामस्वरूप नौ नवंबर 2000 को राज्य अस्तित्व में आया। राज्य बनने के बाद विकास कार्यों तेजी आई है। राज्य में सड़कों को जाल बिछ चुका है। युवाओं को रोजगार मिल रहा है। हालांकि अभी भी कुछ कमियां हैं, जिनके शीघ्र दूर होने की उम्मीद है। -प्रकाश तिवारी प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखंड राज्य निर्माण सेनानी संगठन

अविभाजित यूपी के समय मंडल कमीशन लागू किया गया था। जिसका उस समय हम सभी छात्रों ने पुरजोर किया था। पुलिस ने आंदोलनरत छात्रों को गिरफ्तार कर लिया था। मैं भी जेल में रहा। इसके बाद इस आंदोलन ने राज्य आंदोलन की मांग को मुखर कर दिया था। - रमेश चंद्र जोशी, खटीमा नगर पालिकाध्यक्ष

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