कभी स्टेटस सिंबल रही बंदूक इस समय सिर दर्द से कम नहीं है। हमेशा बॉक्स में रखी रहने वाली बंदूक को चुनाव में निकाल कर थाने में जमा करना होता है। इसे लोग किसी फिजूल काम से कम नहीं मान रहे हैं।
अस्सी के दशक में स्टेटस सिंबल रही बंदूक की जगह अब घर के बड़े बाक्स में हो गई है। चुनाव आया तो उसे निकालना और थाने व बंदूक की दुकान में जमा करना लाइसेंसधारियों की मजबूरी हो गई है। आदर्श आचार संहिता लागू होते ही लाइसेंसधारियों के घर सुबह-सुबह थाने के सिपाही भी पहुंच रहे हैं। वह जल्द बंदूक जमा करने का दबाव बना रहे हैं।
शिक्षा के प्रसार और जागरूकता के कारण कंधे पर बंदूक कमर में पेटी का रिवाज खत्म हो गया है। शासन की ओर से रोक लगाने के कारण शादी विवाह आदि में भी हर्ष फायरिंग नहीं हो रही है। इससे लाइसेंस धारकों ने अपनी बंदूकें डीबीबीएल/एसबीबीएल को सुरक्षा के दृष्टिकोण से बाक्स या अलमारी में बंद कर रखा है। विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पुलिस ने सभी असलहों को थाने में जमा कराने का अभियान चलाया है। ऐसे में लोग लंबे समय से बॉक्स में रखी बंदूक निकाल कर थाने में जमा करने के लिए ले जा रहे हैं जो उन्हें किसी अनावश्यक काम जैसा लग रहा है।