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हिमालय में बदला प्रकृति का दायरा: 520 मीटर ऊपर खिसकी हिमरेखा, गोरी गंगा वाटरशेड में 32 वर्षों में बड़े बदलाव

Mon, 02 Nov 2026 12:37 PM IST
Heera कमल कांडपाल

सार

कुमाऊं विश्वविद्यालय के शोध में गोरी गंगा वाटरशेड में 32 वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण हिमरेखा और वनस्पति सीमाओं के ऊपर खिसकने का खुलासा हुआ है।
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रालम ग्लेश्यिर की हिमरेखा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिमालय की ऊंची चोटियों पर भी जलवायु परिवर्तन का असर दिखने लगा है। तापमान में वृद्धि के साथ हिमरेखा और वनस्पतियों की सीमाएं ऊपर खिसक रही हैं। कुमाऊं विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अध्ययन में गोरी गंगा वाटरशेड में पिछले 32 वर्षों के दौरान बड़े बदलाव सामने आए हैं। लैंडसैट उपग्रहों के आंकड़ों पर आधारित यह शोध स्प्रिंगर नेचर में प्रकाशित हुआ है।

गोरी गंगा वाटरशेड उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी तहसील में स्थित एक प्रमुख हिमालयी नदी बेसिन है। यह वाटरशेड लगभग 2,191.63 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के शोधकर्ता डीएस परिहार और वर्तमान में कपकोट महाविद्यालय में भूविज्ञान विभाग के प्राध्यापक डॉ. निर्मित साह ने वर्ष 1990 से 2022 के बीच इससे संबंधित आंकड़ों का विश्लेषण किया है।

उन्होंने लैंडसैट-5 और लैंडसैट-8 उपग्रहों से प्राप्त पुराने और नए डेटा का इस्तेमाल किया। अध्ययन के मुताबिक वर्ष 1990 में गोरी गंगा वाटरशेड की औसत हिमरेखा 4665.02 मीटर की ऊंचाई पर थी जो 2022 में बढ़कर 5185.47 मीटर पर पहुंच गई। इस तरह 32 वर्षों में हिमरेखा औसतन 520.45 मीटर ऊपर खिसकी है। इसकी औसत वार्षिक दर 16.26 मीटर रही।

अध्ययन में वनस्पति की सीमा में भी बड़ा बदलाव दर्ज किया गया है। वर्ष 1990 में वनस्पति रेखा 4294.97 मीटर की ऊंचाई पर थी जो 2022 में बढ़कर 4890.67 मीटर पर पहुंच गई। यानी इसमें 595.7 मीटर की वृद्धि हुई। वहीं वनों और पेड़ों की ऊपरी सीमा 1990 में 3516.11 मीटर थी जो 2022 में 4196.01 मीटर पर पहुंच गई। इसमें 679.9 मीटर का बदलाव दर्ज किया गया। यह औसतन 21.25 मीटर प्रतिवर्ष की दर से ऊपर खिसकी है।

पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरे की आहट

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शोधकर्ताओं के अनुसार, गोरी गंगा घाटी में बर्फ की मात्रा घटने, सर्दियों के मौसम के पैटर्न में बदलाव और तापमान बढ़ने से स्थानीय पेड़-पौधों, कीटों और जीवों के मौसमी चक्र (फिनोलॉजी) पर असर पड़ रहा है। कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में नींबू वर्गीय फलों की खेती की बेल्ट भी ऊपर की ओर खिसक रही है। इससे स्थानीय कृषि और आजीविका के स्वरूप में बदलाव आ रहा है।

अनियोजित विकास से क्षेत्रीय जलवायु संतुलन प्रभावित
अध्ययन में कहा गया है कि वर्ष 1950 के बाद से पहाड़ी क्षेत्रों में अनियोजित विकास गतिविधियों और मानवीय हस्तक्षेप ने क्षेत्रीय जलवायु संतुलन को प्रभावित किया है। बादल फटने, अत्यधिक बारिश, झीलों और गधेरों के सूखने तथा सर्दियों में सूखे जैसी चरम मौसमी घटनाओं को भी इस बदलाव के संदर्भ में देखा गया है। शोधकर्ताओं ने हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी को बचाने के लिए पर्यावरण-अनुकूल विकास रणनीतियां अपनाने और शहरीकरण की गतिविधियों पर सख्त निगरानी रखने की जरूरत बताई है।

हिमालयी क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी को बचाने के लिए शहरीकरण की सख्त निगरानी करने की आवश्यकता है। तापमान बढ़ने के कारण हिमालयी क्षेत्र में हिमरेखा और वनस्पतियों की सीमा लगातार निचले इलाकों से ऊपर की ओर खिसक रही है। गोरी गंगा घाटी क्षेत्र में बर्फ के कम होने, सर्दियों के पैटर्न बदलने और तापमान में तेजी से वृद्धि होने से मौसमी चक्र बदला है। -डॉ. निर्मित साह, शोधकर्ता

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