कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी वैज्ञानिक डॉ. जितेंद्र कवात्रा।
- फोटो : KASHIPUR
काशीपुर। धान, गेहूं और गन्ने की परंपरागत खेती से हटकर किसान अब नकदी फसलों की खेती करने लगे है। गहरे खेतों में इन दिनों कमल ककड़ी की खेती खूब हो रही है। तराई की कमल ककड़ी की खुशबू दिल्ली तक महसूस की जा रही है।
जनपद ऊधमसिंह नगर में तालाबों की भरमार है। काशीपुर में ही सौ से अधिक तालाब हैं। इनमें से कुछ सरकारी तालाब है, जो प्रशासन ने कमल ककड़ी की खेती के लिए लीज पर दिए हैं। जबकि दर्जनों की संख्या में किसानों के अपने तालाब भी तैयार किए हैं। इन तालाबों में साल में दो बार कमल गट्टे (ककड़ी) की खेती होती है। कमल ककड़ी की पौध जनवरी-फरवरी में लगाई जाती है और जून तक इसकी फसल तैयार हो जाती है। क्षेत्रवार कमल ककड़ी को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। यह भंसीडा, कमल ककड़ी और कमल गट्टे के नाम से प्रचलित है। इसकी जड़ और तना काफी पौष्टिक और स्वादिष्ट होता है। इसकी सब्जी और पकौड़े बनते है। यह तकरीबन दो-तीन फुट लंबी और दो इंच गोलाई तक होती है। दिल्ली की सब्जी मंडी में इसकी काफी डिमांड है। इसमें कैल्शियम की मात्रा काफी अधिक पाई जाती है। लोकल बाजार में यह 100 से 125 रुपये किलो और दिल्ली की मंडी में दो सौ से ढाई सौ रुपये प्रति किलो तक बिकती है। कमल ककड़ी के फूल में दाने के रूप में दूधिया फल लगता है। यह फूल गुलाबी और सफेद रंग का होता है। औसतन एक एकड़ में एक लाख रुपये से अधिक मूल्य की पैदावार हो सकती है।
कमल ककड़ी की खेती किसानों के लिए बेहद लाभकारी है। यह जलीय पौधा है, जो तालाबों में होता है। 21 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान में कमलककड़ी होती है। इसकी पैदावार में काफी कम लागत लगती है। एक एकड़ में 50 से 60 क्विंटल तक पैदावार हो जाती है। कई किसान अपने खेतों में तालाब बनाकर कमल ककड़ी की खेती कर रहे हैं।
-डॉ. जितेंद्र क्वात्रा, प्रभारी कृषि वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र
काशीपुर के तालाब में उगी कमल ककड़ी की फसल।- फोटो : KASHIPUR