रंगमंच से भले ही बॉलीवुड समेत विश्व सिनेमा के कई नामी अभिनेता निकले हों लेकिन सच तो यह है कि वर्तमान में रंगमंच का चलन कम हुआ है। उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यहां रंगमंच और रंगकर्मी सरकारी उपेक्षा की मार झेल रहे हैं। नई पीढ़ी भी रंगमंच से जुड़ने से कतरा रही है। तराई में रंगमंच की वर्तमान स्थिति और पिछड़ने की रंगकर्मियों ने कई वजहें बताईं।
रुद्रपुर निवासी शिक्षक और क्रिएटिव उत्तराखंड के सचिव संदीप सिंह पिछले कई सालों से रंगमंच से जुड़े हैं। मशहूर लेखिका शिवानी की कहानी पिटी हुई गोट के नाट्यमंचन में उनका निभाया गया महीप भट्ट का किरदार बहुत प्रसिद्ध हुआ। इसके साथ ही वह सृष्टि का आदमी, ताजमहल का ठेका जैसे कई नाटक कर चुके हैं। संदीप बताते हैं कि उनका ग्रुप क्रिएटिव उत्तराखंड लंबे समय से बिना किसी सरकारी सहायता के रंगमंच कर रहा है।
सरकारी मदद के अभाव में न तो थिएटर खुल रहे हैं न ही रंगकर्मी सामने आ रहे हैं। कुछ युवा रंगमंच को बॉलीवुड में कॅरियर की सीढ़ी मानते हुए इससे जुड़ भी रहे हैं लेकिन कुछ समय बाद शॉर्ट फिल्मों व एड के माध्यम से कॅरियर की संभावनाएं तलाशना शुरू कर रहे हैं। यदि सरकार मदद करे तो रंगमंच का गौरवशाली अतीत वापस लौट सकता है।
अहसान बख्श की बाल फिल्म अंडर द स्काई में अभिनय कर चुके दिनेशपुर निवासी रंगकर्मी सुनील पंत कहते हैं कि रंगमंच ऐसा मंच है, जहां विभिन्न कलाओं का संगम होता है। रंगमंच बच्चों में रचनात्मकता व सृजनात्मकता का विकास करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सरकार को रंगमंच को बढ़ावा देने का प्रयास करना चाहिए।
सुनील पंत।- फोटो : RUDRAPUR