एनएच-74 भूमि मुआवजा घोटाले में नित नया फर्जीवाड़ा उजागर हो रहा है। किच्छा तहसील के बरा गांव में फर्जी तरीके से 143 कराया और फोरलेन बनने के बाद सड़क को ही बेच दिया। मामला डीएम के संज्ञान में आने पर उन्होंने एसडीएम किच्छा को मामले की जांच के आदेश दिये। जांच में बड़ा घोटाला मिलने पर एसडीएम की संस्तुति पर डीएम ने मामला एसआईटी के सुपुर्द कर दिया है।
डीएम डॉ. नीरज खैरवाल को सौंपी गई जांच रिपोर्ट में एसडीएम नरेश दुर्गापाल ने उल्लेख किया है कि ग्राम बरा में एनएच-74 फोरलेन बनाने के लिए अधिग्रहित की गई भूमि खसरा संख्या 250 और 562 बंदोबस्ती के अभिलेखों में खंती के रूप में दर्ज है। इन खसरों का कुल रकबा 3.7130 हेक्टेयर है। इसमें से 1.5389 हेक्टेयर को राजकीय भूमि और 2.1750 हेक्टेयर को निजी व्यक्तियों की शामिल जोत में दिखाया गया है।
धारा 132 के तहत इस भूमि पर भौमिक अधिकार नहीं दिये जा सकतेे हैं। जांच रिपोर्ट में ही यह भी कहा गया कि बरा गांव को राज्य सरकार ने चकबंदी प्रक्रिया से बाहर रखा जिससे यह भूमि पूर्ववत निजी व्यक्तियों और लोकनिर्माण विभाग के संयुक्त स्वामित्व में दर्ज चली आ रही है, जबकि चकबंदी अधिनियम की धारा 29 क, ख और ग के तहत खंती वाली भूमि को सार्वजनिक प्रयोजन की भूमि मानते हुए इसे राज्य सरकार के पक्ष में दर्ज किया जाना चाहिए था।
इस तरह चकबंदी अधिकारियों की लापरवाही स्पष्ट है। इसके साथ ही बरा में फोरलेन निर्माण के लिए एनएचएआई ने धारा 3-ए के तहत प्रारंभिक सूचना का प्रस्ताव तैयार कर सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर के बाद प्रकाशन कराया जिसमें खसरा संख्या 250 और 562 का प्रकाशन नहीं किया गया है, जबकि नियमानुसार 3-ए के प्रकाशन में निजी और राजकीय सभी भूमि के खसरा नंबरों का प्रकाशन करना अनिवार्य है।
खसरा नंबरों का प्रकाशन ना किये जाने से ही खातेदारों ने भूमि पर फोरलेन सड़क बन जाने के बाद इस भूमि का 143 कराया और दाखिल खारिज कराकर अन्य लोगों को बेच दिया, जबकि इन खसरा संख्याओं में सड़क का निर्माण पहले ही हो चुका था। भूमि खरीदने वालों ने मुआवजे की मांग की तो मामला पकड़ में आ गया।
एसएसपी डॉ. सदानंद दाते का कहना है कि डीएम कार्यालय से प्रकरण की जांच को एसआईटी की जांच में शामिल करने का पत्र मिला है जिसके आधार पर अब एसआईटी पूरे प्रकरण की गहनता से जांच करेगी।