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खेतों में गेहूं के अवशेष (डंठल) जलाने से कम होती है मिट्टी की उर्वरा शक्ति

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काशीपुर। खेतों में गेहूं की फसल का अवशेष (डंठल) जलाने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। इस मिट्टी में पोषकता बढ़ाने वाले कीट नष्ट हो जाते है। इसका विपरीत प्रभाव वायु मंडल पर भी पड़ता है। उर्वरकता कम होने से फसल का उत्पादन भी प्रभावित होता है।
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काशीपुर में इस साल तमाम काश्तकार गेहूं की फसल काटने के बाद फसल के अवशेष (डंठल) जला रहे हैं। इसका कारण इस साल भूसे का दाम अपेक्षाकृत कम होना है। डंठल से भूसा बनाने में एक तो लागत अधिक आ रही है, दूसरे अगली फसल के लिए किसानों के पास समय कम है। कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) के प्रभारी वैज्ञानिक डॉ. जितेन्द्र क्वात्रा ने कहा कि किसानों को गेहूं की फसल का अवशेष नहीं जलाना चाहिए। इसके लिए पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय और कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाया जाता है। डा. क्वात्रा ने बताया कि इस समय जिले में गेहूं की कटाई चल रही है। अगली फसल बोने के लिए किसानों को खेत से गेहूं के अवशेष हटाने होते हैं। इन अवशेषों को जलाने से खेत तो खाली हो जाता है पर मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी आ जाती है। गेहूं के अवशेष जलाने से 100 प्रतिशत नाइट्रोजन, 25 प्रतिशत, 20 प्रतिशत पोटाश और करीब 60 प्रतिशत सल्फर का नुकसान उठाना पड़ता है। इन तत्वों के कम होने से भूमि में मौजूद जैव विविधता का संतुलन बिगड़ जाता है। मिट्टी में होने वाली रासायनिक क्रियाओं के कारण कार्बन-नाईट्रोजन एवं कार्बन-फास्फोरस का अनुपात भी बिगड़ जाता है, जिससे पौधों में पोषक तत्वों की कमी आ जाती है। पौधों को पोषक तत्व न मिलने से जल निकासी भी नहीं हो पाती है। कार्बनिक तत्वों की कमी से जमीन की ऊपरी सतह कठोर हो जाती है और पौधा ठीक से नही पनप पाता। उन्होंने किसानों को अवशेष जलाने की बजाए खेत में ही जोतने की सलाह दी है।
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