आज हमारी बेटियां किसी से कम नहीं हैं। वे अपने साहस से समाज की बुराइयों को खत्म करने के लिए असामाजिक तत्वों से भी लोहा ले रही हैं। ऐसी ही आबकारी निरीक्षक दीप्ति मिश्रा हैं। उन्होंने शराब तस्करों का डटकर मुकाबला किया और बेटियों को अबला कहने वाली परिभाषा को बदल दिया है।
मूलरूप से जिला बागेश्वर, गरुड़ के बैजनाथ निवासी सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य हरीश चंद्र मिश्रा का परिवार हल्द्वानी के मल्ला गोरखपुर में रह रहा है। पेशे से शिक्षक मिश्रा की दो पुत्रियां और एक पुत्र है। सबसे बड़ी पुत्री दीप्ति मिश्रा ऊधमसिंह नगर में आबकारी निरीक्षक हैं। वहीं छोटी पुत्री दीक्षा मिश्रा भी विपणन विभाग में मार्केटिंग इंस्पेक्टर हैं। शराब तस्करों से डटकर मुकाबला करने के बाद चर्चा में आईं आबकारी निरीक्षक दीप्ति मिश्रा का मानना है कि आज लड़कियां लड़कों से कम नहीं हैं। हर क्षेत्र में लड़कियां, लड़कों के कंधों से कंधा मिलाकर चल रही हैं।
अपने पिता हरीश चंद्र और मां इंदिरा मिश्रा की प्रेरणा से उन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा 1995 में बागेश्वर गरुड़ के जीजीआईसी पाए से और इंटर जीआईसी गरुड़ से प्रथम श्रेणी से पास की। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2000 में डीएसबी नैनीताल से बीएससी और 2002 में एमएससी की। उसके बाद 2004 में उन्होंने बीएड किया और 2006 में उनका चयन प्राइमरी स्कूल बागेश्वर में शिक्षिका के पद पर हुआ। 2007 में उनका चयन जीआईसी बागेश्वर एलटी पद के लिए हुआ। 2008 में उन्होंने एमए समाजशास्त्र से करने के साथ ही एनईटी और टीआरएफ की परीक्षा भी पास की। इसके बाद उनका चयन आबकारी निरीक्षक पद के लिए हुआ।
यही नहीं 2013 में उनका पीसीएस 2010 बैच में डीपीओ पद के लिए चयन हुआ है। दीप्ति का कहना है कि बेटी किसी से कम नहीं है। उसे स्वतंत्रता दें, उसे सीखने और आगे बढ़ने का मौका दें। केवल घरों में ही बांध कर न रखे। उनके रास्तों में रुकावट डालने से अच्छा उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दें।