काशीपुर। काशीपुर में कांवड़ बनाने के काम को व्यावसायिक रूप देने वाले अमरनाथ यादव 80 वर्ष की उम्र में भी कांवड़ बनाने का काम कर रहे हैं। अमरनाथ यादव ने महाशिवरात्रि के पर्व को रोजगार के अवसर में बदला और उन्होंने कांवड़ बनाने का काम किया।
मोहल्ला ओझान निवासी अमरनाथ यादव नगर निगम परिसर के पास समाजसेवी अलका पाल के आवास के पास बैठकर कांवड़ बनाते हैं। उन्होंने 35 वर्ष पहले महाशिवरात्रि पर्व को रोजगार के अवसर में बदला। तब से वह प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि पर कांवड़ बनाकर शिवभक्तों को बेचते हैं।
यादव ने बताया कि महाशिवरात्रि पर शिवभक्त हरिद्वार से गंगाजल कांवड़ में रखकर लाते हैं। उन्होंने कांवड़ बनाने का काम शुरू किया लेकिन जैसे-जैसे लोगों में कांवड़ लाने की आस्था बढ़ी उसी रफ्तार से शहर में कांवड़ बनाने वाले बढ़ गए। अब शहर में आठ-दस लोग कांवड़ बनाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भोले की कृपा से सबका काम चल रहा है। कोरोना के कारण दो साल तक शिवभक्त कांवड़ लेने नहीं गए इसलिए दो साल काम ठप रहा।
अमरनाथ महाशिवरात्रि पर्व के दौरान चार-पांच सौ कांवड़ बनाकर बेचते हैं। काशीपुर के अलावा बाजपुर, जसपुर, पीरुमदारा, रामनगर के लोग उनसे कांवड़ खरीद कर ले जाते हैं।
खड़ेश्वरी कांवड़ की सबसे अधिक मांग
काशीपुर। अमरनाथ यादव ने बताया कि कांवड़ खडे़श्वरी, झूलेश्वरी, बैकुंठी, झोली आदि प्रकार की होती है। सबसे अधिक मांग खडे़श्वरी कांवड़ की होती है। झूलेश्वरी व खडे़श्वरी कांवड़ को जमीन पर नहीं रखते हैं। झूलेश्वरी व खड़ेश्वरी कांवड़ में एक बार गंगाजल भरकर उठाने के बाद कंधे से नहीं उतारी जाती है। आवश्यक काम होने पर दूसरा व्यक्ति कांवड़ उठाता है। जबकि बैकुंठी कांवड़ को कहीं भी रख सकते हैं।
इन दिनों युवाओं में झंडे वाली और ऊंची कांवड़ का फैशन चल रहा है। इसमें धार्मिक और राष्ट्रीय झंडे लगे होते है। यह तकरीबन आठ फीट ऊंची होती है। एक कांवड़ की कीमत तीन से पांच सौ रुपये होती है। यादव ने बताया कि कांवड़ निर्माण में बांस के डंडे, बांस की खपचियां, बांधने के लिए सुतली और सजाने के लिए रंग-बिरंगे और चमकीले रिबन का प्रयोग होता है। उन्होंने कहा कि उनकी इच्छा है कि अंतिम सांस तक कांवड़ बनाकर भोले की सेवा करूं। उनके काम को उसका पुत्र रविशंकर यादव आगे बढ़ाएगा। संवाद