तकनीकी क्रांति के अत्यधिक मोह में युवा अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। इसके चलते पहाड़ी बोली, यहां का संगीत, वाद्य यंत्र सभी विलुप्त होते जा रहे हैं। झोड़ा, छपेली, न्यौली, चांचरी आदि नाम अब बूढ़े-बुजुर्गों की ही जुबान पर रह गए हैं। नई पीढ़ी इन्हें भूल चुकी है। ऐसे में एक महिला की ओर से किए जा रहे प्रयास एक खुशनुमा अहसास की तरह हैं जो यू-ट्यूब के माध्यम से युवाओं को पहाड़ी संस्कृति से रूबरू करा रही हैं।
- चांचरी, हुड़किया बौल जैसे पारंपरिक गीत और लोकगीतों को बचाने का प्रयास
- एलबम के जरिये युवाओं को फिर से कुमाऊंनी संस्कृति से रूबरू कराना मकसद
मूलरूप से बागेश्वर की रहने वाली मीरा आर्या ने 19 जुलाई को अपनी दूसरी एलबम ‘रुपैसी मुखुड़ी’ रिलीज की है। लोगों को कुमाऊं की संस्कृति से जोड़ने के लिए उन्होंने अपनी एलबमों में पहाड़ी वाद्य यंत्रों का उपयोग किया है। गानों को मीना राणा, विरेद्र कुमार और राजेश पहरी ने अपनी आवाज दी है। मीरा ने बताया कि पहले रोपाई के दौरान हुड़किया बौल का बोलबाला रहता था। कुमाऊंनी गानों के बोल और हुड़के से निकलने वाली मधुर ध्वनि थकान का अहसास नहीं होने देती।
हालांकि कुछ गांव अब भी हुड़के की थाप पर झोड़ा-चांचरी गाकर रिवाज को बचाने के प्रयास में जुटे हुए हैं। मीरा ने बताया कि आज पहाड़ के युवा अपनी संस्कृति और यहां के परंपरागत वाद्य यंत्र ढोल, दमाऊ और हुड़के को भूल चुके हैं। अपने एलबम के माध्यम से इन्हीं भटके हुए युवाओं को फिर से कुमाऊं की संस्कृति से रूबरू कराना चाहती हैं। लोग भी उनकी पहल को हाथोंहाथ ले रहे हैं। अब तक इस गाने को यू-ट्यूब पर एक हजार लोग देख चुके हैं।
पहाड़ के कोने से निकली सुरीली आवाज
पिथौरागढ़ निवासी कोनी पाठक की आवाज सोशल साइटों पर छाई हुई है। उनके वीडियो को सोशल साइटों पर हजारों लोग देख चुके हैं। हाल ही में उनके एक वीडियो को एक लाख लोगों ने देखा। चैत की उदास घुघुति और मुखुड़ी मयाली के गानों को यू-ट्यूब पर लोगों द्वारा खूब सराहा जा रहा है। देवकी नंदन पाठक और रेनू पाठक की बेटी कोनी ने बताया कि उन्हें बचपन से ही संगीत का माहौल मिला है। पांच भाई बहनों में सबसे छोटी कोनी वर्तमान में बागेश्वर से बीएससी कर रही हैं। उन्होंने कहा कि वह कुमाऊं की संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं।