रुद्रपुर। मात्र 300 रुपये महीना और एक टाइम का खाना देकर मासूमों का बालपन छीनकर उनसे जोखिम भरा काम कराया जा रहा था। हैरानी की बात है कि जिन मशीनों पर काम करते समय अधिक उम्र के लोगों के हाथ कांप जाते हैं उन्हीं मशीनों पर बच्चों से मजदूरी कराई जा रही थी। रेस्क्यू किए गए बच्चों की उम्र मात्र 11 से 17 वर्ष की है।
सिडकुल पंतनगर की एक कंपनी में बाल श्रम के खिलाफ हुई कार्रवाई में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। रेस्क्यू किए गए 17 नाबालिग बच्चों को मात्र 300 रुपये प्रतिमाह और एक समय का भोजन देने का झांसा देकर काम पर लगाया गया था। इसके बदले उनसे रात भर श्रम कराया जा रहा था। अधिकतर बच्चे रुद्रपुर, गदरपुर, दिनेशपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के रहने वाले बताए जा रहे हैं।
पूछताछ में सामने आया है कि कई बच्चे आर्थिक तंगी और परिवार की मजबूरियों के कारण काम करने के लिए विवश थे। अब टीम बच्चों से जोखिम भरा काम कराने के पीछे कौन-कौन जिम्मेदार हैं, इसकी जांच में जुट गई है।
एक चौंकाने वाली बात यह भी है कि लंबे समय से बच्चे यहां मजदूरी कर रहे थे लेकिन श्रम विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगी। सवाल यह भी उठ रहा है कि एक ओर जहां श्रम विभाग लगातार दुकानों से बच्चों का रेस्क्यू कर रहा है वहीं बड़े स्तर जिस तरह से बाल मजदूरी करवाई जा रही है, उसकी जानकारी श्रम विभाग के पास क्यों नहीं पहुंची।
प्रशासन के पास नहीं थी व्यवस्था, नाबालिगों ने रात कंपनी में बिताई
बाल कल्याण के अनुसार, इतनी बड़ी संख्या में बच्चों का रेस्क्यू करने के बाद प्रशासन के पास नाबालिगों को ठहराने की समुचित व्यवस्था नहीं थी। उन्हें रात में रेस्क्यू के बाद भी कंपनी में रखा गया और सुबह होने पर परिजनों को बुलाकर उन्हें चेतावनी देकर उनके सुपुर्द किया गया।
कंपनी कर्मचारी बोले- नाबालिग होते हैं ज्यादा मेहनती
बाल कल्याण के अनुसार, जब टीम ने कंपनी के अंदर मौजूद कर्मचारियों से पूछताछ की तो उन्होंने कहा कि नाबालिग बच्चे ज्यादा मेहनती होते हैं और उसने काम करवाना भी आसन होता है। वह जल्दी थकते नहीं और काम भी समय से खत्म कर लेते हैं।
रात के अंधेरे में काम, उजाला होने से पहले भेज देते थे घर
जांच के दौरान सामने आया कि बच्चों से रात के समय काम कराया जा रहा था। उनकी एंट्री शाम सात बजे के बाद होती थी और सुबह उजाला होने से पहले ही उन्हें कंपनी से बाहर भेज दिया जाता था। आशंका है कि यह व्यवस्था जानबूझकर बनाई गई थी ताकि बाहरी लोगों और निरीक्षण टीमों की नजर बच्चों पर न पड़े।