सहकारी चीनी मिल बाजपुर की स्थिति भी बेहतर नहीं है। मिल 190 करोड़ 53 लाख के घाटे में चल रही है। वर्ष 2013-14 में 42 करोड़ 70 लाख का घाटा हुआ था। गन्ना उत्पादन क्षेत्रफल भी इस साल 20 फीसदी घट गया है। अगर सरकार ने अभी सुधार के उपाय नहीं किए तो इसकी भी हालत गदरपुर चीनी मिल जैसी हो जाएगी।
बाजपुर सहकारी चीनी मिल की स्थापना वर्ष 1959 में हुई थी। इसका शुभारंभ पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने किया था। इसकी पेराई क्षमता 4000 टीसीडी है। इसमें 1129 कर्मचारी कार्यरत हैं। वर्ष 2014-15 का सत्र 29 नवंबर से हुआ। फरवरी तक 33 लाख दो हजार क्विंटल गन्ने की पेराई कर चुका है और 3 लाख 8 हजार 120 क्विंटल चीनी का उत्पादन कर चुका है। किसानों के जनवरी तक के गन्ने का भुगतान हो गया है। अभी भी किसानों की 46 करोड़ 53 लाख रुपयों की देनदारी बाकी है।
चीनी मिल का वर्ष 2011-12 में 796 हेक्टेयर, वर्ष 2012-13 में 7757 हेक्टेयर, वर्ष 2014-15 में 6271 हेक्टेयर रह गया। बताया जाता है कि गन्ना खरीद केंद्रों पर गन्ने की जितनी खरीद दिखाई जाती है। गन्ने की वास्तविक मात्रा उससे कम होती है। कर्मचारी दलाल किसानों के नाम से फर्जी पर्चियां बनवा लेते हैं। घाटे का यह भी एक कारण है।