रुद्रपुर। जिंदगी कभी-कभी ऐसे इम्तिहान लेती है, जिनमें हौसला ही सबसे बड़ा सहारा बन जाता है। अजय बिष्ट की उम्र महज 14 साल थी, जब उनकी दोनों किडनियां खराब हो गईं। अब 26 वर्ष की उम्र में भी उनका जीवन हर हफ्ते दो बार की डायलिसिस पर टिका हुआ है। शरीर कमजोर है, लेकिन जीने की इच्छा अब भी मजबूत है।
घर में अजय का सहारा सिर्फ उनकी मां रेनू देवी हैं। विधवा पेंशन और बेटे की दिव्यांग पेंशन के सहारे बमुश्किल घर का खर्च चलता है। आर्थिक तंगी के बीच सबसे बड़ी चुनौती हर बार बेटे को अस्पताल तक लाना-ले जाना है। अजय की हालत ऐसी नहीं कि वह खुद चल सकें, उन्हें सहारे की जरूरत पड़ती है। ऐसे में मां की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। रेनू देवी की आंखों में चिंता साफ झलकती है, मगर बेटे को बचाने की उम्मीद अभी भी जिंदा है। उनका कहना है कि कई बार सरकारी सिस्टम की शिथिलता ने परेशानी और बढ़ा दी।
मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने पहले नियमों का हवाला देकर एंबुलेंस सुविधा देने से मना कर दिया था। इस समस्या को लेकर वह दो साल पहले तत्कालीन जिलाधिकारी से भी गुहार लगा चुकी हैं, लेकिन पर्याप्त राहत नहीं मिल सकी। हालांकि मंगलवार को स्थिति में कुछ राहत की किरण जरूर दिखी। राजकीय मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डाॅ. जीएस तितियाल ने अजय की गंभीर हालत को देखते हुए तत्काल एंबुलेंस की व्यवस्था कराई। साथ ही आगे भी उन्हें एंबुलेंस के लिए परेशान न होना पड़े, इसके लिए स्थायी आदेश जारी करने की बात कही।
वर्जन
अजय की गंभीर स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए मानवीय आधार पर तत्काल एंबुलेंस की व्यवस्था कर दी गई है। उनकी नियमित डायलिसिस के लिए अस्पताल आना जरूरी है, इसलिए प्रशासन की कोशिश है कि उसे आने-जाने में किसी तरह की दिक्कत न हो। भविष्य में ऐसी परिस्थिति दोबारा न बने, इसके लिए संबंधित विभाग को आवश्यक निर्देश देने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। - डॉ. जीएस तितियाल, प्राचार्य, राजकीय मेडिकल कॉलेज