पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय का सोमवार को 32वां दीक्षांत समारोह मनाया गया। समारोह में 1417 विद्यार्थियों (835 स्नातक, 417 स्नातकोत्तर और 165 पीएचडी की उपाधियां) को उपाधियां दी गईं। कुलपति के 14 स्वर्ण, 11 रजत पदक और 11 कांस्य पदक दिए गए। कुलाधिपति एवं राज्यपाल बेबीरानी मौर्य और कुलपति डॉ. तेज प्रताप ने विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान कीं। चमोली निवासी करुणा कुनियाल (स्नातक) को कुलाधिपति स्वर्ण पदक और कुलपति गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि बुलंदशहर निवासी प्रगतिशील किसान एवं पद्मश्री भारत भूषण त्यागी ने शिरकत की। अध्यक्षता राज्यपाल बेबीरानी मौर्य ने की।
दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कुलाधिपति डॉ. बेबीरानी मौय ने कहा कि वैश्वीकरण के युग में पंतनगर विवि को शिक्षा एवं शोध क्षेत्रों में आए बदलावों के अनुरूप प्राथमिकताओं का निर्धारण करना चाहिए। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यावरण परिवर्तन के परिणाम दिखने लगे हैं। नई परिस्थितियों के अनुसार फसलों पर शोध करना कृषि वैज्ञानिकों की प्राथमिकता होनी चाहिए। कहा कि उत्तराखंड की फसलें पौष्टिक ता और औषधीय गुणों के लिए विश्व में जानी जाती हैं लेकिन प्रदेश में किसानों का जीवनस्तर नीचे है। फसलों का उत्पादन बढ़ाकर किसानों को अधिक से अधिक लाभ देना चाहिए। खेती में बढ़ती लागत को कम करने के लिए पारंपरिक खेती के साथ पशुपालन, मुर्गीपालन को जोड़ने, जैविक खेती को बढ़ावा देने की जरूरत है। राज्यपाल ने मृदा गुणवत्ता, मृदा संरचना और पर्यावरण में सुधार के लिए कार्य करने पर जोर दिया। राज्यपाल ने कहा कि विवि की श्रेष्ठता बार-बार साबित करते रहने के लिए यहां के कार्मिकों का सतत प्रयास करते रहना चाहिए।
कृषि परिवर्तन से पहले प्रकृति को समझने की जरूरत : पद्मश्री त्यागी
पंतनगर। दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि एवं जैविक खेती के लिए मशहूर प्रगतिशील किसान व पद्मश्री भारत भूषण त्यागी ने कहा कि देश करवट ले रहा है। इसमें सभी को साथ चलने की जरूरत है। कृषि में परिवर्तन से पहले प्राकृतिक व्यवस्था को समग्रता से समझने की आवश्यकता है और इसके लिए अनुसंधान होना चाहिए। त्यागी ने आजीवन विश्वविद्यालय के साथ मिलकर किसान एवं राष्ट्रीय हित में कार्य करने का आश्वासन दिया। कहा कि विवि ने उनको सम्मान नहीं एक जिम्मेदारी दी है।
प्रगतिशील किसान भारत भूषण ने कहा कि आजादी के बाद देश में खाद्यान्न उत्पादन का स्वावलंबन पैदा हुआ लेकिन उत्पादकता बढ़ाने के जोश में मृदा एवं मानवीय स्वास्थ्य, पर्यावरण, उत्पाद गुणवत्ता सब पीछे छूट गए। कहा कि कृषि प्रधान देश में गांवों से जो पलायन हो रहा है, वह शहर नहीं संभाल सकते। हमारे देश में ग्राम स्वराज का सपना रहा है लेकिन अब तो कृषि विज्ञान के छात्र भी खेतीबाड़ी नहीं करना चाहते। त्यागी ने कहा कि वर्तमान परिस्थिति में प्रकृति को आधार बनाकर कृषि अनुसंधान करना होगा। एक खेत से एक वर्ष में 12 फसलें साथ-साथ पैदा होती हैं और किसान की आमदनी 4-5 गुना बढ़ती है लेकिन हमारे यहां पहाड़ की उपज मैदान में और मैदान की उपज पहाड़ में पैदा करने की जिद ने दोनों क्षेत्रों की दुर्गति कर दी है।
कृषि विश्वविद्यालयों को सुझाव देते हुए पद्मश्री त्यागी ने कहा कि कृषि विश्वविद्यालयों की मानसिकता में अधिक उत्पादन नहीं अधिकतम समृद्धि होनी चाहिए। कृषि अनुसंधान का स्वरूप प्राकृतिक व्यवस्था के अनुरूप तात्विक, तार्किक और व्यावहारिक होना चाहिए। उन्होंने देश में लघु एवं सीमांत किसानों को ध्यान में रखते हुए समग्रता में स्वावलंबी मॉडल बनाए जाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संकल्प शब्द में समृद्धि है लेकिन हम लाभ के शिकार हैं। हमें अब कुछ ऐसा करने की जरूरत है, जिससे पूरे विश्व में सकारात्मक संदेश जाए।