काशीपुर। गन्ना किसानों को इस पेराई सत्र में सरकार लगभग ढाई सौ करोड़ का भुगतान अपने खजाने से करेगी। चीनी मिलों के भुगतान करने में विफल होने के बाद ऐसी स्थिति बनी है। मिलों के भारी-भरकम खर्च और कम आमदनी के चलते सरकार को किसानों का बकाया अपने खजाने से चुकाना पड़ रहा है।
गन्ना पेराई सत्र अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है। मिलों पर किसानों की देनदारी भी बढ़ती जा रही है। निजी मिलें भुगतान में अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं जबकि कोऑपरेटिव और पब्लिक सेक्टर की मिलें भुगतान करने में फिसड्डी साबित हो रही हैं। इसका मुख्य कारण मिलों का भारी खर्च बताया जा रहा है। मिलों की कमाई से कई गुना ज्यादा उनका खर्च है। ऐसे में मिलें किसानों को पूरे पैसे का भुगतान नहीं कर पा रही हैं। वेतन व अन्य खर्चों को निकालने के बाद मिलें ऐसी स्थिति में नहीं रह जाती हैं कि वे किसानों के बकाये का भुगतान कर सकें। लगभग 40 प्रतिशत पैसा किसानों का मिलों पर अब शेष रह जा है। इस समय 275 करोड़ की देनदारी मिलों पर किसानों की है।
हरिद्वार की निजी मिलों को छोड़कर को-ऑपरेटिव और पब्लिक सेक्टर की मिलें किसानों को पैसे का भुगतान नहीं कर पा रही हैं। ये मिलें सरकार के अधीन होने के चलते बकाये का भुगतान सरकार को करना पड़ रहा है ताकि किसानों को आर्थिक परेशानी से बचाया जा सके। बीते वर्ष सरकार ने किसानों के लगभग 200 करोड़ रुपये का भुगतान किया था। इस वर्ष गन्ना मूल्य बीते वर्ष की अपेक्षा ज्यादा होने के चलते यह रकम लगभग ढाई सौ करोड़ होने का अनुमान है। हाल ही में निदेशालय के अधिकारियों ने इस संबंध में गन्ना एवं चीनी आयुक्त हंसा दत्त पांडे से विचार-विमर्श किया है। गन्ना आयुक्त ने पहली किस्त के रूप में अवशेष के 25 प्रतिशत का भुगतान करने की बात शासन के अधिकारियों से कही है। ये पैसा चार दिन के अंदर किसानों को मिलने की उम्मीद है।
इसलिए मिलें नहीं चुका पाती हैं गन्ना मूल्य का बकाया
को-ऑपरेटिव और पब्लिक सेक्टर की मिलों का खर्च ज्यादा है। इनमें स्थायी कर्मचारी कार्य करते हैं जिनका वेतन सरकारी कर्मचारी की भांति होता है। मिलें जो चीनी बनाती हैं उस पर प्रति क्विंटल लगभग 58 सौ रुपये का खर्च आता है जबकि चीनी 3500 से 3600 रुपये प्रति क्विंटल तक ही बिकती है। ऐसे में को-ऑपरेटिव और पब्लिक सेक्टर की मिलें लगातार घाटे में जा रही हैं। इसके चलते किसानों को गन्ना मूल्य का बकाया पैसा नहीं मिल पाता है यह पैसा सरकार को चुकाना पड़ता है। बीते वर्ष भी यही स्थिति थी और इस वर्ष भी यही स्थिति बनी हुई है।
भारी भरकम खर्च के चलते को-ऑपरेटिव और पब्लिक सेक्टर की मिलें किसानों का गन्ना बकाया चुकाने में असमर्थ हैं। निजी मिलों ने लगभग 80 प्रतिशत गन्ना मूल्य का भुगतान कर दिया है जबकि पब्लिक सेक्टर व को-ऑपरेटिव की मिलें लगभग 40 प्रतिशत भुगतान ही कर पाई हैं। बीते वर्ष भी लगभग 200 करोड़ का भुगतान सरकार ने किया था और इस वर्ष भी लगभग ढाई सौ करोड़ का भुगतान सरकार किसानों को करेगी। इसके लिए तैयारी की जा रही है।- हंसा दत्त पांडेय, गन्ना एवं चीनी आयुक्त उत्तराखंड