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आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं सहकारी समितियों के 218 कर्मचारी

Sun, 11 Dec 2016 12:18 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो काशीपुर
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जिले की सहकारी समितियों के कर्मचारी छह से 10 महीने से वेतन नहीं मिलने की वजह से भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं। गन्ना विभाग की ओर से दो महीने पहले इन कर्मचारियों को उनके वेतन का जल्दी भुगतान करने का भरोसा दिया गया था। इसके बाद भी इन्हें वेतन का भुगतान नहीं मिल पाया है।

जिले की 8 सहकारी समितियों को शासन से कमीशन न मिल पाने के कारण इनमें तैनात करीब 218 कर्मचारियों कई महीनों से वेतन नहीं मिल पाया है। इनमें से कुछ कर्मचारियों का छह से, कई को  दस महीने के वेतन का भुगतान नहीं हो पाया है। आर्थिक तंगी से जूझ रहे इन कर्मचारियों में कुछ सीजनल तो कुछ नियमित कर्मचारी हैं। वेतन भुगतान की मांग को लेकर इन कर्मचारियों ने  बीते 5 सितंबर से 22 सितंबर तक गन्ना समिति परिसर और गन्ना आयुक्त कार्यालय में धरना दिया।
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 गन्ना विभाग के अधिकारियों ने उन्हें समितियों का कमीशन का बकाया जल्द देने का भरोसा दिया था।  इसके बाद भी  कार्यवाही न होने पर कर्मचारियों 17 अक्तूबर को गन्ना आयुक्त कार्यालय पर आमरण अनशन शुरू किया था।


इसको देखते हुए 18 अक्तूबर को सहायक गन्ना आयुक्त शैलेंद्र सिंह ने उन्हें जल्दी समितियों का बकाया भुगतान करने का आश्वासन देकर आमरण अनशन तुड़वा दिया था। तब से अब दो महीने बीतने  गए हैं, लेकिन अधिकारी अपने वायदे पर खरे नहीं उतरे। लंबे समय से वेतन नहीं मिलने की वजह से कर्मचारियों को अब परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। परेशान कर्मचारी फिर से आंदोलन शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं। गन्ना आयुक्त के जन संपर्क अधिकारी कमल जोशी ने बताया कि पूरे प्रदेश की सहकारी गन्ना समितियों का पेराई सत्र 2015-16 के कमीशन का 18 करोड़ 35 लाख, सेवानिवृत्त और मृतकों के देयकों का 8 करोड़ 2 लाख रुपए बाकी है। यूएसनगर, नैनीताल की गन्ना समितियों के पेराई सत्र 2015-16 का कमीशन करीब सात करोड़ बाकी है। सरकार ने प्रदेश की सभी सहकारी समितियों के लिए 10 करोड़ रुपए जारी करने के आदेश दिए हैं।
    
इंसेट:
काशीपुर में है 40 कर्मचारी
काशीपुर। ऊधमसिंह नगर की सहकारी समिति काशीपुर में 40, किच्छा में 37,  पंतनगर में 5, सितारगंज में 41,खटीमा में 25,गदरपुर में 19 कर्मचारी हैं। इसके अलावा हल्द्वानी में 14 कर्मचारी स्थाई और सीजनल हैं।



- गन्ना सहकारी समिति काशीपुर के लिपिक  भारत सिंह ने कहा कि 10 महीने से वेतन नहीं मिला है, जिससे परिवार का खर्चा चलाना कठिन हो गया है। बिजली का बिल, उपचार, खर्चा चलाने के लिए परिचितों के आगे हाथ फैलाना पड़ रहा है। लंबा आंदोलन करने के बाद अधिकारियों ने कर्मचारियों को धोखा दिया।


-  प्रमोद कुमार ने बताया कि वेतन नहीं मिलने से जीवन यापन करना मुश्किल हो गया है। राशन वालों ने तो उधार देने से हाथ खींच लिया है। नोट बंदी से संकट और गहरा गया है। जिससे भी रुपए उधार मांगने जाते है, वे बैकों से रुपए नहीं मिलने का बहाना बनाकर टरका देते हैं। घरेलू खर्चा, बच्चों की फीस देने के लिए कर्मचारी परेशान हैं।


- राजीव कुमार ने कहा कि वेतन नहीं मिलने से घर में चूल्हा जलाना मुश्किल होने लगा है। दिन भर ड्यूटी करने के बाद जब घर जाते हैं, तो बच्चे यही पूछते हैं कि वेतन मिला कि नहीं।
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- सीजनल कर्मचारी वीरभान सिंह ने बताया कि वर्ष 2015-16 के कार्य का तीन महीने का वेतन नहीं मिला है। इस साल भी उनको वेतन नहीं मिल रहा है। बिना वेतन के परिवार के खाने पीने की व्यवस्था करना कठिन हो गया है। नोट बंदी के कारण कोई मदद नहीं कर रहा है।


 
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