बाघ केवल तराई के जंगल तक नहीं सिमटा हुआ है, वह समुद्र तल से 30 मीटर की ऊंचाई वाले तराई के जंगल से लेकर तिब्बत सीमा के करीब और 3500 मीटर से ज्यादा ऊंचाई वाले अस्कोट (पिथौरागढ़ जिले) तक बर्फीले इलाके में पहुंच गया है। पहली बार मध्य हिमालय में बाघ के पहुंचने के वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को वैज्ञानिक साक्ष्य (कैमरा ट्रैप में फोटो) मिले हैं।
वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया, देहरादून (डब्ल्यूआईआई) पहाड़ के इलाकों में अध्ययन कर रहा है। इसी के तहत डब्ल्यूआईआई ने पिथौरागढ़ जिले में अध्ययन शुरू किया गया। इसी के तहत 3629 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अस्कोट रेंज में कैमरे लगाये गए थे। इन स्वचालित कैमरों की हाल में जांच की गई, तो उसमें बाघ की फोटो मिली है। यह फोटो भी एक नहीं बल्कि दो बार कैमरे में कैप्चर हुई है।
इन कैमरों में पहली बार 13 मार्च 2016 को सुबह 9:41 पर पहली बार बाघ की फोटो कैप्चर हुई। तीन अप्रैल को दोपहर 2:17 दोबारा कैमरे फोटो कैप्चर हुई है। मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं डा. राजेंद्र सिंह बिष्ट कहते हैं कि जहां पर बाघ दिखाई दे रहा है, उसके आसपास बर्फ भी दिखाई दे रहा है। पहली बार बाघ इस इलाके में वैज्ञानिक साक्ष्य के आधार पर रिपोर्ट हुआ है।
आखिरकार बाघ इतनी ऊंचाई वाले पहुंचने का असली कारण क्या है, किसी रास्ते से कहां से कब पहुंचा होगा, यह आगे के वैज्ञानिक अध्ययन से ही पता चल पायेगा। डीएफओ डा. पराग मधुकर धकाते ने अस्कोट एरिया में बाघ रिपोर्ट होने की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि इससे पता चलता है कि टाइगर दूसरी परिस्थितियों में अपने को ढाल लेता है। अब कैमरा ट्रैप जैसे आधुनिक उपकरण मौजूद हैं, जिससे और भी नई जानकारी सामने आ सकती है।
नदी सहारे पहाड़ चढ़ा होगा बाघ
नैनीताल के कैमल बैक में करीब तीन साल पहले बाघ रिपोर्ट हुआ था, लेकिन नैनीताल वन प्रभाग तराई के जंगल से जुड़ा हुआ है। ऐसे में यहां से आसानी से बाघ नैनीताल तक पहुंच सकता है। पर अस्कोट के आसपास बाघ से जुड़ा कोई भी इलाका नहीं है। पर अब इस बाघ के मिलने के बाद कई तरह के कयास लगाये जा रहे हैं।
पहला कयास यही है कि बाघ पूर्व भी यहां पर मौजूद रहा हो, लेकिन उसकी पहली बार कैमरा ट्रैप लगने से उसकी पुष्टि हुई हो। पहाड़ के निवासी भी बाघ होने का दावा पहले भी करते रहे हैं। वनाधिकारियों के अनुसार बाघ नदी के सहारे ही पहाड़ की तरफ चढ़ा होगा।