उत्तराखंड आपदा के बाद पहली बार केदारधाम यात्रा पर जाने वाले यात्रियों को इस बार धाम में पवित्र कुंडों के दर्शन नहीं हो पाएंगे। पांच अक्टूबर से बाबा केदार के दर्शन करने के लिए यात्रा शुरू हो रही है।
अस्थायी हवन कुंड बनाया गया
केदारधाम के पांच कुंडों में से एकमात्र रेतस कुंड हैं, जिसका कुछ भाग दिखाई दे रहा है। अन्य कुंड मलबे में दबे हुए हैं। 16/17 जून को आई आपदा से केदारनाथ मंदिर के आसपास स्थित कुंड मलबे में दब गए। इनमें रेतस, हंस, उदक और अमृत कुंड में जल रहता था, जबकि हवन कुंड यज्ञ के काम आता है। इस बार केदारनाथ मंदिर परिसर में यज्ञ के लिए अस्थायी हवन कुंड बनाया गया है।
मंदिर है, तो कुंड भी होने चाहिए
केदारनाथ धाम को पांच पर्वतों, पांच नदी धाराओं और पांच कुंडों की भूमि कहा जाता है। केदारनाथ मंदिर के साथ ही नदियों और कुंडों का इतिहास भी जुड़ा है। इसलिए एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) भी कुंडों के पुनरोद्धार को आवश्यक मानती है। केदारनाथ संरक्षण परियोजना के निदेशक डॉ. रामनाथ सिंह फोनिया बताते हैं कि मंदिर और कुंड दोनों का आपस में सीधा संबंध हैं। यदि मंदिर है, तो कुंड भी होने चाहिए। उन्होंने बताया कि जिन स्थानों पर कुंड थे, वहां सफाई के लिए बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति को कहा गया है।
ये हैं कुंड
हंस कुंड: केदारनाथ मंदिर से करीब 100 मीटर दूर दायीं ओर स्थित। हंस कुंड में पितरों का श्राद्ध किया जाता है। आत्मा की शांति के लिए जन्म कुंडली और दाह संस्कार के समय की राख कुंड में विसर्जित की जाती है। मान्यता है कि इस स्थान पर पिंड दान करने से वह सीधे पितरों को प्राप्त होता है। यहां पितरों को मुक्ति मिलती है। इसीलिए केदारनाथ धाम केवल्य धाम यानि मोक्ष धाम के नाम से भी जाना जाता है। केदारखंड में उल्लेखित है कि यहां पर ब्रह्मा जी ने हंस रूप धारण किया था।
रेतस कुंड: मंदिर से करीब 500 मीटर दूर सरस्वती नदी के तट पर स्थित। केदारखंड में लिखा गया है कि इस कुंड के जलपान से मनुष्य शिवरूप हो जाता है। कहा जाता है कि यहां ऊं नम: शिवाय का जप करने पर पानी में बुलबुले उठते हैं।
अमृत कुंड: मंदिर के पृष्ठ भाग में स्थित। इस कुंड के जल से केदार बाबा के ज्योतिर्लिंग का जलाभिषेक किया जाता था।
उदक कुंड: मंदिर से करीब 100 मीटर पहले स्थित। कहा जाता है कि शिवलिंग को चढ़ाया गया जल इस कुंड में एकत्रित होता था। जिसे श्रद्धालु अपने साथ प्रसाद स्वरुप ले जाते थे।
हवन कुंड: मंदिर परिसर में आगे की ओर स्थित है। यहां पर हवन किए जाते हैं।