भारतीय सनातन परंपरा में पित्रों का कर्ज उतारने के लिए उनका श्राद्ध जरूरी बताया गया है। श्राद्ध करने वाले को इसका फल (पित्रों का आशीर्वाद) अवश्य मिलता है।
इस बार श्राद्ध के मौके पर गजच्छाया योग बनने से इसे और भी पुण्यदायी माना जा रहा है। वर्ष 2005 के बाद इसी वर्ष यह योग बन रहा है। त्रयोदशी तिथि, मघा नक्षत्र के साथ ही हस्त नक्षत्र पर यदि सूर्य संक्रमण हो तो ही गजच्छाया योग बनता है।
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30 सितंबर वर्ष 2005 के बाद इस साल त्रयोदशी तिथि यानी दो अक्तूबर को यह योग बन रहा है। ज्योतिषियों की मानें तो इस दिन श्राद्ध करने से कई गुना पुण्य मिलता है। आचार्य भरत राम तिवारी के अनुसार भविष्य पुराण के अनुसार पितृ कर्म वश अंतरिक्ष में वायवीय शरीर धारण करते हैं।
पितृ श्राद्ध काल में वायु रूप में आते हैं इसलिए सब लोग उनको देख नहीं पाते। सूक्ष्म शरीर धारी होने के कारण पितृ अग्नि एवं वायु प्रधान होते हैं। यही वजह है कि लोक-लोकांतर में आने-जाने में उन्हें कोई रुकावट नहीं होती।
सोलह दिनों का श्राद्ध
श्राद्ध की तिथि सोलह होती हैं हालांकि कभी इसमें एक तिथि क्षय तो कभी एक बढ़ी हुई भी हो सकती है। भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से अश्विन कृष्ण अमावस्या तक पित्रों का तर्पण करना चाहिए। जिस स्त्री का पुत्र ना हो वह स्वयं अपने पति का श्राद्ध कर सकती है और जिस व्यक्ति का कोई ना हो वह स्वयं मरने से पहले अपने श्राद्ध आदि की क्रियाएं पूरी कर सकता है।
ऐसे करें तर्पण
श्राद्ध तिथि पर जल-तिल, कुश, दूध, पुष्प, अक्षत से तर्पण किया जाता है। ब्राह्मणों को भोजन, पंचबलि-गाय, कौआ, कुत्ता, अग्नि, चीटियों को अन्न दिया जाता है। कुछ लोगों का मत है कि गया श्राद्ध करने के बाद महालय श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। परंतु ये शास्त्र-सम्मत नहीं है। गया में श्राद्ध करने के बाद भी घर में श्राद्ध किए जाने चाहिए।
श्राद्ध की कुछ विशेष तिथि
द्वादशी तिथि पर - संन्यासियों का
चतुर्दशी तिथि पर - दुर्घटना में मरने वालों का
अमावस्या पर - जिनकी मरने की तिथि पता ना हो