टिहरी बांध के कारण खतरे की जद में आए प्रभावितों का पुनर्वास नहीं हो पाया है। प्रभावितों का कहना है कि वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान सत्तापक्ष एवं विपक्ष के लोगों ने गांवों के पुनर्वास का आश्वासन दिया था, लेकिन आजतक नहीं हो पाया। प्रभावित इस बार वोट मांगने के लिए गांवों में घुसने नहीं देने की चुनौती भी दे रहे हैं।
भागीरथी और भिलंगना घाटी के झील के आसपास निवासरत 45 गांव के 190 परिवारों का पुनर्वास नीति, 104 का कोलेट्रल डैमेज पालिसी और 120 परिवारों का देखरेख के तहत पुनर्वास होना है। पुनर्वास निदेशालय ने खतरे की जद में आए प्रभावितों का वर्ष 2010 में भू-गर्भीय सर्वे करवाया था, जिसमें ये परिवार पुनर्वास को पात्र पाए गए थे। लेकिन पुनर्वास निदेशालय के पास पुनर्वास को भूमि नहीं होने के कारण आवासीय, कृषि भूखंड आवंटित नहीं पाए।
सीएम के निर्देश पर दिसंबर 2015 में अधिकारियों ने ऋषिकेश में पशुपालन की 14.21, आईडीपीएल की 39.21 और मंशादेवी, दूधूपानी से बीबीवाला तक 65.31 हेक्टेयर भूमि पर प्रभावितों का पुनर्वास करने का प्रस्ताव तैयार कर नौ माह बाद 19 अगस्त में एनओसी के लिए भूमि का प्रस्ताव केंद्र को भेजा था। इस पर केंद्र ने आपत्तियां लगा कर 25 अगस्त को लौटा दिया।
आपत्तियों का निराकरण करने के बावजूद सरकार ने अभी तक केंद्र सरकार को प्रस्ताव नहीं भेजा है, जिससे पुनर्वास को जमीन नहीं मिल पाई है। बांध प्रभावित संघर्ष समिति के अध्यक्ष सोहन सिंह राणा, प्रधान प्रदीप भट्ट, राम सिंह, जबर सिंह का कहना है कि वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में सत्तापक्ष, विपक्ष के लोगों ने पुनर्वास का भरोसा दिया था, लेकिन समस्या जस की तस बनी है।
केंद्र सरकार ने जिन छह बिंदुओं पर आपत्ति लगाई थी, इसमें से चार का निराकरण किया गया है। अब शासनस्तर पर वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वीकृति संबंधी दो आपत्ति का निराकरण होना बाकी है। इसके बाद ही प्रस्ताव केंद्र को जाएगा।
-देवेंद्र नेगी, प्रभारी अधिकारी पुनर्वास।