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17 सालों में नहीं हुई पृथक राज्य के उद्देश्यों की पूर्ति

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घनसाली (टिहरी)। उत्तराखंड आंदोलन के जन नेता स्व. इंद्रमणी बडोनी की 93 जयंती 24 दिसंबर को प्रदेश में संस्कृति दिवस के रूप में मनाई जाएगी, लेकिन उनके द्वारा वर्षों से चलाया गया जन आंदोलन और जन भावनाओं की अपेक्षा के अनुरूप राज्य निर्माण के डेढ़ दशक बाद भी स्थाई राजधानी का गठन नही हो पाया है।
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उतर प्रदेश बृहद राज्य होने के कारण पहाड़ी क्षेत्रों का विकास नहीं होने से क्षुब्ध होकर स्व. इंद्रमणी बडोनी ने वर्ष 1977 में तीसरी बार विधायक चुने जाने के बावजूद पहाड़ी क्षेत्र की उपेक्षा होने के कारण मात्र तीन वर्ष चार माह के कार्यकाल में अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था। वर्ष 1979 को पृथक उत्तराखंड राज्य की लड़ाई के लिए उत्तराखंड क्रांति दल का गठन कर पृथक राज्य के गठन के बाद ही चुनाव लड़ने का संकल्प लेकर प्रदेशभर में जन यात्रा निकाल कर पहाड़ के लोगों को अलग राज्य की लड़ाई के लिए प्रेरित करने का काम किया था।
स्व. बडोनी ने दो अगस्त 1994 को पृथक राज्य की मांग को लेकर पौड़ी कमिश्नरी के समक्ष 54 दिन तक अनशन किया। दो अक्तूबर को दिल्ली जंतर-मंतर पर राज्य निर्माण के लिए प्रदर्शन करने जा रहे राज्य आंदोलनकारियों को मुजफ्फरनगर में रोककर पुलिस ने महिला-पुरुषों पर गोलियां चलाई, वहीं कुछ असामाजिक तत्वों ने इंद्रमणी बडोनी को दिल्ली जंतर-मंतर के मंच पर घायल कर दिया था, उसके बाद पूरे राज्य में दोनों घटनाओं की बात आग की तरह फैल गई और जगह-जगह विरोध प्रदर्शन होने लगे। उसके बाद बडोनी के स्वास्थ्य में लगातार गिरावट आने लगी और 18 अगस्त 1999 को बिठल आश्रम ऋषिकेश में उनका निधन हो गया। उनके निधन के दो वर्ष बाद राज्य का गठन हो गया था, लेकिन राज्य निर्माण के 17 वर्ष बाद भी राजधानी गैरसैण नहीं बन पाई। स्व. इंद्रमणी बडोनी मंच के अध्यक्ष लोकानंद डंगवाल, रमेश उनियाल ने कहा कि जिस उद्देश्य के लिए बडोनी ने राज्य गठन की मांग उठाई थी, वह 17 सालों में भी पूरी नहीं हो पाई।
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स्व. बडोनी जी का जीवन परिचय
जन्म 24 दिसंबर 1925 को ग्यारहगांव अखोड़ी में।
पिता का नाम -सुरेशानंद बडोनी
प्राथमिक शिक्षा -अखोड़ी में
इंटर मीडिएट -पीआईसी पुरानी टिहरी।
स्नातक - डीएवी कालेज देहरादून
वर्ष 1954 में 29 वर्ष की आयु में निर्विरोध प्रधान बने
वर्ष 1955 में जखोली प्रथम ब्लाक प्रमुख बने
1962 तथा 67 में देवप्रयाग से दो बार विधायक चुने गए
1977 में फिर निर्दलीय विधायक चुने गए। और यूपी में पर्वतीय विकास परिषद के उपाध्यक्ष बने
पहाड की उपेक्षा होने पर तीन वर्ष चार माह में त्याग पत्र दे दिया
15 वर्ष की आयु में सुरजा देवी के साथ विवाह
18 अगस्त 1999 में ऋषिकेश बिठल आश्रम में निधन
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