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संस्कृति विभाग की चार महत्वपूर्ण योजनाएं नहीं चढ़ परवान

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नई टिहरी। संस्कृति विभाग की चार महत्वपूर्ण योजनाएं बजट के अभाव में परवान नहीं चढ़ पाई हैं। वर्ष 2015 में सरकार ने लुप्त हो रही वाद्ययंत्र परंपरा को बचाने के लिए प्रशिक्षण केंद्र, ऐतिहासिक धरोहरों को संजोने को संग्रहालय, जनक्रांति नायक रहे श्रीदेव सुमन और विक्टोरिया क्रॉस विजेता वीसी गबर सिंह का प्रवेश द्वार स्वीकृत किया था, लेकिन दो साल बाद भी योजनाओं के निर्माण को बजट जारी नहीं हो पाया। इसके चलते योजनाओं का निर्माण शुरू नहीं हुआ।
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नगर में बिखरी पड़ी पुरानी टिहरी की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए नई टिहरी में संग्रहालय बनाने की मांग कई वर्ष से चली आ रही थी। अविभाजित उत्तर प्रदेश में संस्कृति मंत्री रहे पूर्व सीएम डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने भी शहर में संग्रहालय बनाने की घोषणा की थी, वह भी पूरी नहीं हो पाई। संस्कृति मंत्री रहते पूर्व मंत्री दिनेश धनै ने नगर में चार करोड़ 86 लाख 30 हजार से संग्रहालय, चार करोड़ 94 लाख 56 हजार की लागत से वाद्ययंत्र प्रशिक्षण केंद्र, शहर के डाइजर में श्रीदेव सुमन और चंबा में वीसी गबर सिंह के नाम से 50-50 लाख के प्रवेश द्वार स्वीकृत करवाए थे। स्वीकृत चारों योजनाओं के निर्माण को शासनादेश भी जारी हुआ था। जिला प्रशासन ने संग्रहालय, प्रशिक्षण केंद्र के लिए ब्लॉक में पांच नाली भूमि भी संस्कृति विभाग को उपलब्ध करवा दी है। तब उम्मीद की जा रही थी कि जल्द योजनाओं का निर्माण शुरू हो जाएगा। बावजूद इसके योजनाओं के निर्माण को बजट न मिलने से कार्य प्रारंभ नहीं हो पाया। प्रशिक्षण केंद्र में प्रशासनिक भवन, 150 लोगों के बैठने के लिए सभागार, दो सौ लोगों के प्रशिक्षण के लिए भवन बनना था। इसमें ढोल, दमाऊ, रणसिंगा, सुराई, डौंर, थाली और मसकबीन का प्रशिक्षण दिया जाना प्रस्तावित था, जबकि संग्रहालय में सभागार, आर्ट गैलरी समेत अन्य निर्माण होने थे। इनमें पुरानी टिहरी की ऐतिहासिक धरोहर, महापुरुषों के जीवन से संबंधित जानकारी, पुस्तकालय आदि बनाया जाना था।

इनका है कहना-
वाद्ययंत्र प्रशिक्षण केंद्र, संग्रहालय, श्रीदेव सुमन, वीसी गबर सिंह प्रवेश द्वार पूर्व में स्वीकृत हुआ था। निदेशालय ने स्वीकृति योजनाओं का निर्माण शुरू करवाने हेतु शासन से बजट मांगा था, लेकिन अभी बजट नहीं मिल पाया है। असके चलते योजनाओं का काम शुरू नहीं हो पाया। उम्मीद है कि जल्द बजट मिल जाएगा।
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-बीना भटट, संस्कृति निदेशक।
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