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...तो अब क्या 'शिव नगरी' को जमीन निगल जाएगी

Mon, 05 Aug 2013 03:37 PM IST
उत्तरकाशी/रविंद्र थलवाल
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पिछले साल बाढ़, इस साल फिर से बाढ़ और अब एक और नया खतरा उत्तरकाशी के बाशिंदो में खौफ पैदा कर रहा है। उत्तरकाशी से बड़े पैमाने पर लोग पलायन कर रहे हैं।
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उत्तरकाशी नगरवासियों को सावधान रहने की जरूरत है। नगर पर चारों ओर से खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। बरसों से आसमानी आफत झेल रहे नगर के लोगों को अब जमीनी आफत भी झेलनी पड़ सकती है।

भू-वैज्ञानिकों ने जताई चिंता
भागीरथी नदी का तल ऊंचा होने से शहर के घर तथा होटलों में पानी के स्रोत फूट गए हैं। भू-वैज्ञानिकों की माने तो इससे मकानों पर दरारें आने की संभावना ज्यादा हो बढ़ गई है और पहले से ही कमजोर भवन भरभराकर गिर सकते हैं।
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वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि पानी का रिसाव इसी तरह से तेज होता गया तो बड़े खतरे से भी इंकार नहीं किया सकता। अगस्त 2012 की बाढ़ से  संगमचट्टी से गंगोंरी तक और गंगोरी से मनेरा तक नदी में चार लाख 35 हजार 550 घनमीटर मलबा जमा हो गया था।

पिछली बाढ़ ने पहले ही बढ़ा दिया था खतरा
दिसंबर 2012 में आपदा प्राधिकरण की टीम ने सर्वे कर मलबे हटाने के लिए सात स्थान चिहिन्त किए। इसके बावजूद मात्र 15 हजार घन मीटर मलबा ही हटाया गया। इसके बाद इस दफा भी बीते 16-17 जून को आई बाढ़ से भी भागरथी में भारी मलबा जमा हो गया है।

यही कारण है कि भागरथी नदी का तल भी उठकर उत्तरकाशी शहर के संमानांतर पर पंहुच गया है। नदी  का लेवल बढ़ जाने से इसका असर भी दिखने लगा है। नदी से 500 मीटर दूर लोगों के घरों व व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में पिछले कई दिनों से पानी के स्रोत फूट पड़े हैं।

मोटर से निकाल रहे पानी
घरों से इतना ज्यादा पानी निकल रहा है कि लोगों को पानी बाहर फेंकने के लिए मोटर का सहारा लेना पड़ रहा है। पानी का स्रोत फूटने से लोगों में दहशत का माहौल भी पैदा हो गया है। पानी के साथ हल्का रेत भी आ रहा है।

इनकी भी सुनिएः
घरों में आ रहे पानी की सफाई नगर पालिका से करवाई जाएगी। जरूरत पड़ी तो भू-वैज्ञानिकों से यह भी पता लगवाया जाएगा कि यह पानी कहां से आ रहा है। भू-वैज्ञानिकों की टीम भटवाड़ी क्षेत्र में जा रखी है।
- डा. पंकज पांडेय, डीएम उत्तरकाशी।

यदि नदी का तल यदि शहर के बराबर है तो नदी के पानी के रिसाव से मना नहीं किया जा सकता है, लेकिन वास्तविक स्थिति का पता जांच करने के बाद ही लग पाएगा। इससे घरों में दरारें आने की संभावना बनी रहती है।
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- डा.एन बालागन, एसोसिएट प्रोफेसर अर्थ साइंस डिपार्टमेंट आईआईटी रूड़की
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