श्रावण कृष्ण चतुर्दशी के दिन गंगा जल से भगवान आशुतोष का अभिषेक होता है। इस दिन को श्रावणी शिवरात्रि भी कहा जाता है। इसी दिन भगवान शंकर ने पार्वती को तंत्र विज्ञान सिखाया था।
इसी दिन योगियों के लिए शिवस्वरोदय का ज्ञान भगवान शंकर ने दिया था। श्रावण कृष्ण चतुर्दशी को शिव ने अपना डमरू बजाकर चौदह महेश्वर सूत्रों का संधान किया और पाणिनी ने जिह्वा की शुद्धि के लिए व्याकरण शास्त्र की रचना की।
इस बार शिव चौदस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह गरु के नक्षत्र पुर्नवसु में पड़ रही है। चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान हैं और शिवरात्रि चंद्रमा के दिन सोमवार को पड़ रही है।
भारतीय प्राच्य विद्या सोसायटी के अध्यक्ष डा. प्रतीक मिश्रपुरी ने बताया कि इस दिन चंद्रमा का संयोग बुध और सूर्य से हो जाए तो जल चढ़ाने के लिए बारह मुहूर्त मिलते हैं।
यह संयोग 1938 में आया था। अब 102 वर्षों के बाद शिव चौदस के दिन सूर्य बुद्ध की युति चंद्रमा पर हो रही है। यह नजारा शनि से भी दृष्ट होगा।
डा. प्रतीक मिश्रपुरी के अनुसार सूर्य, बुध, चंद्रमा की युति पर शनि की उच्चतम दृष्टि पड़ने से बारह मुहूर्त आते हैं। इन मुहूर्तों में जलाभिषेक करने से मनुष्य के सभी संताप मिट जाते हैं और अनेक विद्याओं की प्राप्ति उसे होती है।
गिलोय के रस से शिव का करें अभिषेक
डा. प्रतीक मिश्रपुरी ने बताया कि समस्त वर्णाश्रम के लिए शिव चौदस का महत्व है। जिस व्यक्ति पर शनि का प्रकोप हो, वह यदि शिवरात्रि के दिन गिलोय के रस से शिव का अभिषेक करे तो कल्याण निश्चित है। धन के लिए गन्ने के रस, पुत्र के लिए दूध और सभी मनोकामनाओं की शुद्धि के लिए गंगा जल से अभिषेक होना चाहिए।