हौंसलों ने तोड़ी गम-ए-दीवार-ए-जिंदां (जेल)-वो देख फिर जिंदगी मुस्करा दी। पहाड़ पर आई प्रलय को मात देकर निकली बच्ची नन्ही परी डिप्रेशन से बाहर आ गई है। बच्ची ने जुबान खोली तो शब्दों से उसकी माटी की गंध आ गई।
उसे हल्का से गुदगुदाया तो खूब खुलकर हंसी। नाम पूछा तो बोली-ज्योति। वह सेंट्रल यूपी के कानपुर परिक्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा खूब समझ रही है।
बुधवार दोपहर एक बजे यह संवाददाता जब दून अस्पताल के प्राइवेट वार्ड पांच में नन्ही परी को देखने पहुंचा तो वह खाना खा रही थी। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सरिता, सीमा, भगवती और यशोदा मना-मना कर उसे खिलाती।
वह कभी हंसती तो कभी त्योरी चढ़ा लेती। उसे बेटा, बेटी कहकर पुकारा तो अपने में जुटी रही। ऐ, बिटिया खाना खाती हो का? उसने हां में सिर हिलाया।
बेटा साड़ी पहनोगी? वह चुप रही। बिटिया धोती पहनिओ। फिर हां में सिर हिला दिया। ऐ, बिटिया तोहार नाम का है? ज्योति। चाय पिहियो? उसने फिर हां में सिर हिलाया। वह चार तक गिनती गिन लेती है।
हरा, लाला, पीला, नीला रंग पहचानती है। वह अम्मा, दादी, पापा शब्द सेंट्रल यूपी में बोली जाने वाली हिंदी के टोन में बोलती है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सरिता ने बताया कि वैसे तो ज्योति खुश रहती है। लेकिन सोते में अभी चौंक जाती है। एक दिन सोते में कह रही थी-अम्मा, हाथ छोड़ दे, छोड़ दे।
फिर उठकर बैठ गई। उन्होंने बताया कि टीचर्स कालोनी में रह रही कानपुर की समाज सेविका ने वहां की भाषा में बात की तो उससे ज्योति खूब घुलमिल गई। उसकी पूरी बात समझती रही। पहाड़ों पर तबाही के दौरान यह बच्ची जिस ट्रक से आ रही थी, वह खाई में गिर गया।
ड्राइवर और यह बच्ची बचे थे। बच्ची के दोनों पैर टूट गए हैं। जब वह आई तो शॉक में थी। कुछ न बोलती थी तो इस संवाददाता ने उसका नामाकरण नन्ही परी कर दिया। आज वह इसी नाम से लोगों के बीच में पहचानी जाती है, लेकिन अभी अपनी असली पहचान नहीं पा सकी है।